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आदर्श और हकीकत

आलोचनाएं और विवाद न आम आदमी पार्टी के लिए नई चीज हैं और न ही अरविंद केजरीवाल के लिए। मगर पार्टी और उसके नेता, दोनों ही इनके बीच से रास्ता निकालकर अपनी राह पर बढ़ने का हुनर जानते हैं। इसलिए राज्यसभा की सीटों के लिए टिकट वितरण को लेकर जो आलोचनाएं हर ओर दिख रही हैं, उससे वे जरा भी विचलित होंगे, ऐसा नहीं लगता। लेकिन इस बार की आलोचनाएं जरा अलग किस्म की हैं। इस बार ये आलोचनाएं उनके विरोधी ही नहीं कर रहे, बल्कि वे लोग कर रहे हैं, जो आमतौर पर उनकी हिमायत करते हैं। विरोधी तो अपना विरोध-धर्म हमेशा ही निभाते हैं, लेकिन अगर समर्थक भी विरोध करने लगें, तो मामला गंभीर हो जाता है। इसे हमें एक तरह से और भी देखना चाहिए। राज्यसभा के लिए उम्मीदवारों का चयन पार्टियां और उसके नेता अपनी सोच, अपनी रणनीति, अपनी जरूरत और अपने राजनीतिक व अन्य दबावों के हिसाब से करते रहे हैं। समर्थक भी इसे मानकर चलते हैं, इसलिए वे ऐसे फैसलों पर अक्सर उंगली नहीं उठाते। कुछ ऐसे नेता और उनके समर्थक जरूर उठाते हैं, जो दावेदार थे, पर असफल रहे। लेकिन आम आदमी पार्टी का मामला कुछ अलग है। इसके वे समर्थक भी उंगली उठा रहे हैं, जिनका किसी उम्मीदवार से हित-अहित नहीं जुड़ा। बुधवार की शाम से ही पूरा सोशल मीडिया विरोध की ऐसी आवाजों से भरा पड़ा है।

इतने बड़े पैमाने पर होने वाला विरोध यह तो बताता ही है कि आम आदमी पार्टी से इसके समर्थकों और कार्यकर्ताओं की उम्मीदें बहुत बड़ी हैं। वे आदर्श राजनीति की उम्मीद से ही पार्टी से जुडे़ हैं और उसका किसी भी प्रकार का विचलन उन्हें मंजूर नहीं। आम आदमी पार्टी एक ऐसे राजनीतिक जन-आंदोलन की उपज है, जिसने एक दौर में पूरे देश की राजनीति को ही हिला दिया था। चुनावी राजनीति में उतरने के बाद उसके प्रभाव का भूगोल भले ही सीमित रह गया हो, लेकिन एक भावना के स्तर पर आज भी बड़ी संख्या में लोग उससे जुड़े हैं। और वे उम्मीद करते हैं कि पार्टी हर कदम पर उनकी अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी। राज्यसभा चुनाव के लिए जिस तरह के नाम सामने आए हैं, उससे उनकी ये भावनाएं आहत हुई हैं। पार्टी का दोष यह तो है ही कि उसने समर्थकों की अपेक्षाओं को काफी बढ़ा दिया था। अर्थशास्त्री रघुराम राजन से लेकर नारायणमूर्ति और टीएन शेषन जैसे कई नाम पार्टी की ओर से चलाए गए थे। लेकिन अंत में जो नाम सामने आए, उनसे लोगों का आहत होना स्वाभाविक भी था। आम आदमी पार्टी हमेशा से यही कहती रही है कि उम्मीदवारों के चयन में कार्यकर्ताओं, यहां तक कि मोहल्ला समितियों का फैसला सर्वोपरि होना चाहिए, ऐसे आदर्श जब हकीकत की धरती पर उतरते हैं, तो उनका रूप कुछ दूसरा ही होता है। 

व्यावहारिक राजनीति में यह माना जाता है कि किसी भी पार्टी के आदर्श उसके दिशा-निर्देशक तत्व भर होते हैं, पार्टी को सिद्धांत की नहीं, हकीकत की सख्त और ऊबड़-खाबड़ जमीन पर खड़े होना और आगे बढ़ना होता है। इसलिए उसके फैसले उसकी जरूरतों, उसकी मजबूरियों और तमाम राजनीतिक दबावों के बीच से निकलते हैं। वे आदर्शों को स्थापित करने के लिए नहीं, आदर्शों की ओर बढ़ने के लिए होते हैं। हमें नहीं पता कि आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा के लिए जिन उम्मीदवारों का चयन किया है, उसके पीछे उसकी सोच क्या है? हमें यह भी नहीं पता कि पार्टी उनमें अपना भविष्य किस तरह देख रही है? अब वह कोई आंदोलन नहीं है, बल्कि मुख्यधारा की एक पार्टी है, और अन्य पार्टियों की तरह ही वह अपने फैसले कर रही है, तो फिर इसमें हैरत कैसी?
 

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  • Web Title:Hindustan Editorial on 05 January