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असंतोष और आंदोलन

हिन्दुस्तान टीमMadan Tiwari
Tue, 03 Nov 2020 09:33 PM
असंतोष और आंदोलन

आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन इस देश के लिए कोई नई बात नहीं है। हालांकि कुछ लोगों को यह बात थोड़ी अजीब जरूर लग सकती है कि इस समय जब देश एक महामारी से संघर्ष कर रहा है, तब आंदोलन जैसी कोई बात नहीं होनी चाहिए। ऐसे आंदोलन मास्क लगाकर नहीं होते और सामाजिक दूरी का कोई सिद्धांत यहां नहीं दिखता है। लेकिन यह भी सच है कि ऐसे आंदोलन अक्सर असंतोष की उपज होते हैं और इस समय असंतोष चरम पर है। लॉकडाउन शुरू होने के बाद जिस तरह देश में बेरोजगारी बढ़ी है, उसे देखते हुए असंतोष के कारणों को समझा जा सकता है। ऐसे में, जब अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के दावे किए जा रहे हैं, बेरोजगारी कम होने के बजाय बढ़ रही है। 

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी द्वारा जारी आंकड़े बता रहे हैं कि सितंबर के मुकाबले अक्तूबर में बेरोजगारी दर और बढ़ी है। भारत में राजनीति हमेशा से ही कुछ इस तरह से चलती रही है कि लोग रोजगार की मांग को लेकर सड़कों पर उतना नहीं उतरते, जितना आरक्षण की मांग को लेकर उतरते हैं। हालांकि यह आंदोलन चलाने वाले भी जानते हैं कि इसके जरिए कुछ लोगों को नौकरी जरूर मिल सकती है, लेकिन इससे पूरी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। 
राजस्थान में गुर्जर समुदाय के आंदोलनकारी फिलहाल आरक्षण की मांग को लेकर जिस तरह से सड़कों और रेल पटरियों पर जमे हुए हैं, उनके असंतोष को भी हमें इसी तरह से समझना होगा। वैसे गुर्जर समुदाय को पिछड़ी जाति के तौर पर आरक्षण का लाभ दिया जाता है, लेकिन यह आरक्षण उन्हें संतुष्ट करने में समर्थ नहीं है और वे चाहते हैं कि उन्हें अति-पिछड़ी जाति के तौर पर आरक्षण दिया जाए। 

वैसे यह मांग भी कोई नई नहीं है और कई बार पहले भी उठ चुकी है। एकाध बार तो ऐसे आंदोलन सामुदायिक तनाव और संघर्ष में भी बदले हैं, लेकिन आमतौर पर ऐसे आंदोलन चुनाव के आस-पास होते हैं और उन्हें राजनीति का हिस्सा मान लिया जाता है। लेकिन इस बार जहां आंदोलन चल रहा है, वहां कोई चुनाव सामने नहीं है, इसीलिए इस असंतोष को बढ़ती बेरोजगारी के संदर्भ में समझना जरूरी है। आमतौर पर ऐसे आंदोलनों की आग में एक और चीज घी डालने का काम करती है, वह है कृषक समुदाय की बदहाली। लगातार बदहाली के कारण अब किसान परिवारों के युवा कृषि में अपना भविष्य नहीं देखते, लेकिन जब वे अपने पुश्तैनी काम के बाहर कोई रोजगार खोजते हैं, तो इसके अवसर वहां बहुत ज्यादा उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें लगता है कि आरक्षण उनके अवसरों को थोड़ा बढ़ा सकता है। फिर अपने देश में जो राजनीति चल रही है, उसमें आरक्षण सिर्फ समुदाय के सामाजिक उत्थान का ही मामला नहीं है, बल्कि उसकी राजनीतिक ताकत का प्रतीक भी बन गया है।

सरकारों के लिए यह संकट का समय भी होता है और उसके राजनीतिक कौशल की परीक्षा का भी। अगर आप सीधे से आरक्षण दे दें, तो कई दूसरे समुदायों के संगठन भी ऐसी ही मांग के साथ आगे आ जाएंगे। पिछले दिनों केरल में आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई, तो इसके खिलाफ ही आंदोलन शुरू हो गया। इस असंतोष का सही समाधान तो बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करना ही है, कुछ और नहीं।

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