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11 अप्रैल, 2021|9:46|IST

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ट्रुडेव की यात्रा से आगे

आठ दिन की यात्रा पर आए कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडेव जब भारतीय शैली में नमस्ते करते हुए उत्साह के साथ दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरे, तो शायद उन्हें पहला सदमा लगा होगा, जब वहां ‘वार्म वेलकम’ में उन्हें एक खास ‘गर्मजोशी’ नहीं दिखी होगी, जो हाल के दिनों में आम रही है। यह एक खास किस्म का ठंडापन था, जिसके अपने संदेश हैं। भारतीय हलकों में भी इसे कौतुक से ही देखा गया। यह कौतुक बना रहा, जब वह आगरा में ताज के सामने या साबरमती में पारंपरिक भारतीय परिधान पहनकर चरखा चलाते हुए परिवार के साथ फोटो खिंचा रहे थे। कौतुक इसलिए था कि आधिकारिक यात्रा पर आने के बावजूद हवाई अड्डे पर जस्टिन ट्रुडेव का स्वागत करने के लिए वहां प्रधानमंत्री तो नहीं ही पहुंचे, जो हाल के दिनों में कई शासनाध्यक्षों का प्रोटोकॉल तोड़कर गर्मजोशी से स्वागत करने को तत्पर रहे हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश और गुजरात जाने पर भी उनका स्वागत वहां के मुख्यमंत्रियों या किसी वरिष्ठ मंत्री ने नहीं, वहां की प्रशासनिक मशीनरी ने किया।

इसने बता दिया कि भारत अगर मित्र से गर्मजोशी दिखाना जानता है, तो वक्त-जरूरत सख्त संदेश देने से गुरेज नहीं करता। ट्रुडेव भले ताजमहल के सामने, साबरमती में चरखा चलाते या स्वर्णमंदिर में रोटी बेलकर कारसेवा की फोटो खिंचा अभिभूत महसूस करें, लेकिन वह असल सवाल तो उन्हें भी साल रहा होगा, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। शायद इसीलिए उन्हें कहना पड़ रहा है कि ‘यह यात्रा करीबी रिश्ते और अतुलनीय अवसरों से जुड़ी है और यह हाथ मिलाने और तस्वीरें खिंचवाने के अवसर तलाशने की यात्रा नहीं है।’ ट्रुडेव को अनायास ही यह भी नहीं कहना पड़ा कि यह राजनीतिक समीकरणों से परे जाकर लोगों से रिश्ता बनाने का समय है और वह यही कर रहे हैं, क्योंकि सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते आगे बढ़ाने का वह इसी को आधार मानते हैं। संदेह नहीं कि इस सबके पीछे कनाडा के सिख समुदाय का वोट बैंक और खालिस्तान आंदोलन से ट्रुडेव की करीबी कहीं न कहीं बड़ा कारण है। ट्रुडेव सरकार के कई मंत्रियों की खालिस्तान आंदोलन से करीबी जगजाहिर है। यहां तक कि ट्रुडेव की लिबरल पार्टी कनाडाई सिखों के वोट और उससे भी ज्यादा उनकी फंडिंग पर बुरी तरह आश्रित है। प्रधानमंत्री बनने के बाद खुद ट्रुडेव भी खालिस्तानियों के दबदबे वाले ‘खालसा दिवस’ समारोह में शामिल हो चुके हैं, यह अलग बात है कि उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री इससे बचते रहे हैं।
यह पहली बार नहीं हो रहा, जब भारत-कनाडा रिश्तों में खालिस्तान की खटास उभरती दिखाई दे रही है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को किसी राष्ट्र या नेता की उपेक्षा के रूप में देखना उचित नहीं। ऐसा कुछ हुआ भी नहीं है। विवाद बेबुनियाद नहीं है, यह तब जाहिर हो गया, जब उनके मुंबई कार्यक्रम में सजायाफ्ता आतंकी जसपाल अटवाल की मौजूदगी पाई गई। इतना ही नहीं, वह ब्रिटिश उच्चायोग में होने वाले रात्रि भोज के आमंत्रितों में भी था। बाद में यह भोज ही निरस्त कर दिया गया। कनाडा की सफाई के बावजूद मुमकिन है कि इसका असर आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात पर भी दिखे। लेकिन इसे ट्रुडेव और कनाडा के लिए एक सबक के रूप में तो लिया ही जाना चाहिए। यह भी याद रखना चाहिए कि राजनीति में कुछ भी अनायास नहीं होता।

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  • Web Title:hindustan editorial of 23 February