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मानसून का इंतजार

कंक्रीट के जंगलों से सप्ताहांत में पहाड़ों की ओर भागने वालों के लिए अब वहां भी बहुत राहत नहीं, क्योंकि मसूरी, देहरादून जैसी जगहें भी अब तपने लगी हैं। उत्तर भारत में जब तापमान 47 डिग्री सेल्सियस के...

मानसून का इंतजार
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Monika Minalहिन्दुस्तानTue, 18 Jun 2024 11:59 PM
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उत्तर भारत में जब तापमान 47 डिग्री सेल्सियस के ऊपर कहर बरपा रहा है और मौसम विभाग गरमी के रिकॉर्ड टूटने के एलान कर रहा, ठीक उसी समय पूर्वोत्तर के सिक्किम में मूसलाधार बारिश से हुए भू-स्खलन के कारण करीब दो हजार पर्यटकों को ‘एयरलिफ्ट’ करने की नौबत आन पड़ी है। भू-स्खलन की वजह से राष्ट्रीय राजमार्ग-10 के क्षतिग्रस्त होने के कारण बंगाल और सिक्किम का सड़क संपर्क टूट गया है। एक तरफ, असह्य गरमी और लू के कारण लोग अपनी जान गंवा रहे, तो दूसरी ओर भू-स्खलन के कारण लोगों के मारे जाने की खबरें मिल रही हैं। इन दो अतियों के बीच प्रकृति शासकीय व्यवस्था और इंसानी सब्र व अक्ल की परीक्षा ले रही है। प्रशासनिक तंत्र की परीक्षा इस मायने में कि जल और बिजली की निर्बाध आपूर्ति तमाम राज्य सरकारों के आगे एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हो गई है, तो वहीं नागरिकों का इम्तिहान इस लिहाज से कि सब्र के साथ मानसून का इंतजार करते हुए वे पर्यावरण को और ज्यादा बिगड़ने न देने के क्या कुछ सबक सीख पाए!
कुदरत नाराज है, इसे जानने के लिए किसी नजूमी की अब दरकार नहीं, क्योंकि दुनिया भर के खगोल विज्ञानी दशकों से आगाह करते आ रहे हैं कि धरती की आबोहवा तेजी से बिगड़ रही है। साइंसदां यह तक बता चुके हैं कि किन-किन वजहों से पृथ्वी का जलवायु परिवर्तन हो रहा है और इसके कारण चक्रवाती तूफानों व अतिवृष्टि या अनावृष्टि की बारंबारता बढ़ रही है। मगर न दुनिया का राजनीतिक नेतृत्व इसे लेकर पर्याप्त गंभीर दिखा और न सुविधापरस्त आबादी ही संवेदनशील हुई है। कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर विकसित देश लगातार चालें चलते रहे हैं और हालत यह है कि आज से ठीक एक साल पहले संयुक्त राष्ट्र ने बताया, सन् 1997 से 2022 के बीच अकेले यूरोप के ग्लेशियरों की लगभग 880 क्यूबिक किलोमीटर बर्फ पिघल चुकी है। अब जब संकट बिल्कुल दरवाजे पर आ खड़ा हुआ है, तब भी कोई ठोस आश्वस्ति नहीं है कि पर्यावरण को बचाने के लिए युद्ध-स्तर पर कदम उठाए जाएं।
बहरहाल, उत्तर भारत को बेसब्री से मानसून की प्रतीक्षा है। इसकी रफ्तार पर करीब से नजर रख रहे मौसम विज्ञानियों का कहना है कि इस महीने के अंत में उत्तर भारतीय राज्यों में मानसून के पूरी तरह सक्रिय होने के बाद ही गरमी से निजात मिल सकेगी, हालांकि उसके पहले हल्की फुहारें फौरी राहत दे सकती हैं। इस साल बेहतर मानसून का पूर्वानुमान किसानों के लिए जहां शुभ सूचना है, वहीं यह शहरी निकायों के कर्ताधर्ताओं की फिर एक बार परीक्षा लेगा। देश वर्षों से स्मार्ट सिटी के सपने देख रहा है। मगर दुर्योग से हमारे शहर जलभराव और लंबे जाम के लिए ही सुर्खियों में रहते हैं। इसी तरह, भवन-निर्माण महकमे को भी शहरों की जर्जर इमारतों को चिह्नित कर जरूरी एहतियाती कदम उठा लेने चाहिए। वैसे तो मौसम के बिगड़े मिजाज का सबसे बुरा असर गरीब लोगों पर पड़ता है, मगर इस बार की भीषण गरमी ने सुविधाकामी लोगों को भी बता दिया कि कुदरत उनको बख्शने नहीं वाली। कंक्रीट के शहरी जंगलों से सप्ताहांत में पहाड़ों की ओर भागने वालों के लिए अब वहां भी बहुत राहत नहीं, क्योंकि मसूरी, देहरादून जैसी जगहें भी अब तपने लगी हैं। इसलिए बेहतर होगा कि तरक्की की इमारतें खड़ी करते हुए प्रकृति के साथ तालमेल न बिगाड़े जाएं, तब मानसून के इंतजार में यूं तड़पना न पड़ेगा! 

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