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हिंसा अक्षम्य

मतदान के बस दो चरण शेष हैं और मतगणना की ओर बढ़ते देश में विशेष रूप से पुलिस प्रशासन को सचेत और चौकस रहना होगा। यह बहुत दुखद और शर्मनाक है कि बिहार के छपरा शहर में मतदान में कथित अनियमितता को लेकर...

हिंसा अक्षम्य
Monika Minalहिन्दुस्तानTue, 21 May 2024 09:59 PM
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मतदान के बस दो चरण शेष हैं और मतगणना की ओर बढ़ते देश में विशेष रूप से पुलिस प्रशासन को सचेत और चौकस रहना होगा। यह बहुत दुखद और शर्मनाक है कि बिहार के छपरा शहर में मतदान में कथित अनियमितता को लेकर भाजपा व राजद के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा में एक की मौत हो गई और दो गंभीर रूप से घायल हो गए। सारण लोकसभा सीट पर सोमवार को ही मतदान हुआ है और पार्टी कार्यकर्ताओं में बेचैनी गौरतलब है। मगर बेचैनी अगर हिंसा पर उतारू होगी, तो जाहिर है, अप्रिय स्थिति बन जाएगी। कम से कम दो दशक बाद बिहार में इस तरह का तनाव दिखा है, तो पूरे प्रशासन को अमन-चैन बहाल रखने के लिए सक्रिय हो जाना चाहिए। जब टक्कर कांटे की होती है, तब एक-एक वोट के लिए संषर्घपूर्ण स्थिति बन जाती है। चुनाव में वोट लेने के लिए परस्पर सियासी संघर्ष की स्थिति तो ठीक है, लेकिन हिंसा का सहारा कोई नहीं ले सकता। आधुनिक दौर में अगर चुनाव की वजह से किसी की जान चली जाए, तो इससे दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता। जो लोग चुनाव से खिलवाड़ कर रहे या मतगणना बाद कुछ गड़बड़ी करने की सोच रहे हैं, उनके प्रति तो किसी भी तरह की रियायत नहीं बरतनी चाहिए। 
एक समय था, जब देश में चुनाव होते थे, तब कहीं-कहीं ताकत का खेल खूब होता था, लेकिन अब लोकतांत्रिक फैसलों में ताकत के इस्तेमाल के लिए कोई जगह नहीं है। सारण में प्रशासन ने दो दिन के लिए इंटरनेट सेवाओं को भी निलंबित कर दिया है। हिंसाग्रस्त इलाकों में अफवाह फैलने और उसका दुष्प्रभाव होने की आशंका रहती है। अत: आदतन हिंसा करने वालों या हिंसा के लिए जिम्मेदार किसी भी उग्र व्यक्ति पर अंकुश जरूरी है। जो कार्यकर्ता हिंसा के जरिये अपनी निष्ठा का प्रदर्शन करना चाहते हैं, उन पर निश्चित ही लगाम लगनी चाहिए। तमाम दलों को यह भी देखना चाहिए कि हिंसक कार्यकर्ता वास्तव में लाभ की तुलना में अपनी पार्टी को नुकसान ही ज्यादा पहुंचाते हैं। सहज और सभ्य कार्यकर्ताओं के बल पर ही पार्टी अपने लिए ज्यादा से ज्यादा वोट बटोरती है। ध्यान दीजिए, पश्चिम बंगाल में लगभग हर चरण में पार्टी कार्यकर्ताओं या समर्थकों के बीच झड़प हो रही है। बंगाल की सियासत के साथ हिंसा का पहलू जुड़ा हुआ है, लेकिन बिहार ने तो बड़ी मुश्किल से इस स्याह पहलू से अपना दामन छुड़ाया है। फिर चुनावी हिंसा की ओर लौटने कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी चाहिए।
वैसे चुनाव का तनाव एकाधिक राज्यों में साफ दिखने लगा है। परिणामों का बेसब्री से इंतजार है, लेकिन सब्र और निगरानी की सबसे ज्यादा जरूरत है। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव की सभाओं में भगदड़ की स्थिति भी चिंता बढ़ाती है। पुलिस व प्रशासन को विशेष रूप से एहतियाती कदम उठाने चाहिए। सभाओं में भगदड़ का आखिर क्या मकसद है? क्या पार्टी की सभाओं में इतनी भीड़ जुटने लगी है कि स्वाभाविक ही भगदड़ की स्थिति बन जा रही है? ऐसे में, प्रशासन को सावधान हो जाना चाहिए, उतनी ही भीड़ जुटनी चाहिए, जितनी संभल में आ सके। भीड़ पर लाठी बरसाने का फैसला तो और भी विचारणीय है। भीड़ के बीच असामाजिक तत्वों की पहचान कर उन पर शिकंजा कसना ज्यादा सभ्य व न्यायपूर्ण कदम है। नेताओं को भी हिंसा के प्रति सचेत रहना चाहिए, क्योंकि अमन-चैन के लिए वे भी पुलिस व प्रशासन के समान ही जिम्मेदार हैं।  

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