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फिर रेल हादसा

रेलवे ने नेताओं को सियासत का मौका दे दिया है। ध्यान रहे, सियासत को रोका नहीं जा सकता, पर दुर्घटनाओं को जरूर रोका जा सकता है। पश्चिम बंगाल में रेल दुर्घटना जितनी दुखद है, उतनी ही विचारणीय है। यह बात...

फिर रेल हादसा
Monika Minalहिन्दुस्तानMon, 17 Jun 2024 09:21 PM
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पश्चिम बंगाल में रेल दुर्घटना जितनी दुखद है, उतनी ही विचारणीय है। यह बात पहली नजर में ही साफ हो गई है कि दुर्घटना मानवीय भूल की वजह से हुई है। एक मालगाड़ी ने अगरतला से सियालदह जा रही कंचनजंघा एक्सप्रेस को पीछे से टक्कर मारी है। हादसे के समय कंचनजंघा एक्सप्रेस खड़ी थी और मालगाड़ी के लोको पायलट ने रेड सिग्नल की परवाह नहीं की या उसे देखना जरूरी नहीं समझा। सोमवार सुबह हुई इस दुर्घटना में करीब 9 लोग काल के गाल में समा गए और पचास से ज्यादा घायल हुए हैं। जाहिर है, इस भयानक टक्कर में मालगाड़ी के ड्राइवर और एक्सप्रेस ट्रेन के गार्ड की भी जान चली गई है। ज्यादा नुकसान गार्ड कोच और दो पार्सल वैन को हुआ है, इस वजह से यात्रियों पर बहुत ज्यादा असर नहीं हुआ है। जिस गति से बचाव कार्य किया गया है, उसकी तारीफ करनी चाहिए। इसके साथ ही पीड़ितों की चिकित्सा के साथ ही मुआवजा घोषित करने में भी पर्याप्त तेजी दिखाई गई है। 
दरअसल, इस हादसे के पीछे केवल मानवीय विफलता नहीं है। बताया जा रहा है, स्वचालित सिग्नन-प्रणाली भी खराब थी, इसकी वजह से सियालदह कंचनजंघा एक्सप्रेस खड़ी हो गई थी। मालगाड़ी के ड्राइवर ने भी सिग्नल की अवहेलना की। यह समग्रता में रेलवे की नाकामी है। इस टक्कर को टाला न जा सका। अब यहां जांच में कई सवाल खडे़ होंगे? सिग्नल क्यों खराब था और अगर सिग्नल खराब था, तो रेल अधिकारी दुर्घटना को रोकने के लिए क्या वैकल्पिक उपाय कर रहे थे? इक्का-दुक्का निचले कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहरा देना पर्याप्त नहीं होगा? केंद्रीय रेल मंत्री मौके पर पहुंच गए हैं, तो उन्हें हादसे की वजहों की पूरी पड़ताल करनी चाहिए। अब ऐसे हादसे पहले की तुलना में बहुत कम होते हैं, लेकिन इनका होना पूरी रेल सेवा पर ही प्रश्नचिह्न लगा देता है। ऐसे प्रश्नचिह्नों के सहारे जाहिर है, सियासत भी तेज होती है। ऐसे में, सत्तारूढ़ पार्टी और केंद्र सरकार को निशाना बनाया जा रहा है, तो आश्चर्य नहीं। देश में हादसों पर सियासत का लंबा इतिहास रहा है और रेलवे ने यह मौका दिया है। ध्यान रहे, सियासत को रोका नहीं जा सकता, पर दुर्घटनाओं को जरूर रोका जा सकता है। भारत में जब तेज गति से रेलगाड़ियां दौड़ने लगी हैं, तब तो दुर्घटनाओं की आशंका को शून्य बनाने में ही सबकी भलाई है।
अव्वल तो इस हादसे के दोषियों को आपराधिक लापरवाही की वजह से घेरा जाना चाहिए। दूसरी बात, जब बारिश का मौसम आ ही चुका है, तब दूरदराज के तमाम इलाकों में सिग्नल क्षमता व पटरी की स्थिति को युद्ध स्तर पर परख लेना चाहिए। खराब मौसम भी अक्सर हादसों की वजह बनता है। विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और नेटवर्क की जांच जरूरी है। तीसरी बात, अक्सर चर्चा होती है कि रेलवे में बहुत पद खाली हैं, ऐसे में, यह भी मान लिया जाता है कि कहीं न कहीं रेल संचालन और सेवा गुणवत्ता में कमी रह जा रही है, जिसका खामियाजा हम यदा-कदा भुगतते रहते हैं। ऐसी कमी या मजबूरी का अंत होना चाहिए। चौथी बात, पिछले वर्षों से चर्चा होती रही है कि भारत में ही विकसित रेल टक्कर-रोधी प्रणाली ‘कवच’ आ गई है, एक पटरी पर दो ट्रेनों के करीब आते ही परिचालन स्वयं थम जाएगा। कहने की जरूरत नहीं कि बिना देरी तमाम ट्रेनों को कवच पहनाने का कार्य युद्धस्तर पर होना चाहिए।  

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