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अबू धाबी में मंदिर

संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में स्वामी नारायण मंदिर के निर्माण के गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक निहितार्थ हैं और इनको पढ़ा व अंगीकार किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने...

अबू धाबी में मंदिर
Monika Minalहिन्दुस्तानWed, 14 Feb 2024 09:08 PM
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संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में स्वामी नारायण मंदिर के निर्माण के गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक निहितार्थ हैं और इनको पढ़ा व अंगीकार किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार, 14 फरवरी को इस मंदिर का उद्घाटन किया। करीब पांच साल पहले उन्होंने ही इसका शिलान्यास भी किया था। लगभग 27 एकड़ में 700 करोड़ रुपये की लागत से बना यह भव्य मंदिर यूएई में काम करने वाले लाखों हिंदुओं की आस्था को अवलंब देने के साथ-साथ पश्चिम एशिया के बारे में रूढ़ कई धारणाओं को भी ध्वस्त करता है। निस्संदेह, यह दुनिया को सांप्रदायिक सद्भाव का पैगाम दे रहा है। पश्चिम एशिया के इस्लामी देशों के बारे में शेष दुनिया में यह आम धारणा रही है कि किसी अन्य मजहब की इबादतगाहों के लिए उनके यहां गुंजाइश नहीं है। इस धारणा को अपने स्वार्थों के तहत पश्चिमी मीडिया ने दुनिया भर में स्थापित करने की कोशिश की और खुद इस्लामी कट्टरपंथियों और आतंकी तंजीमों ने उसको पुख्ता किया। हालांकि, ईरान, तुर्किए से लेकर सीरिया तक में दुनिया के सबसे पुराने चर्चों में से कुछ स्थित हैं। बहरीन के मनामा में 200 साल पुराना श्रीनाथजी का मंदिर है।
दरअसल, पश्चिम एशियाई देशों के निजाम अब इस हकीकत को तस्लीम कर चुके हैं कि वैज्ञानिक नजरिये वाली मौजूदा दुनिया में मजहबी कट्टरपंथ के दायरे में सिमटकर रहने से सिर्फ नुकसान उठाया जा सकता है, इसीलिए उन्होंने न सिर्फअपने धार्मिक आचार-व्यवहार और सामाजिक जीवन से जुड़ी कई रूढ़ियों व नियमों से मुक्ति की ओर कदम बढ़ाया, बल्कि दूसरे समुदायों की धार्मिक-सांस्कृतिक रुचि पर भी गौर करना शुरू किया। मिसाल के लिए, सऊदी अरब में 1970 के दशक से बंद थिएटरों को चंद सालों पहले वहां के क्राउन पिं्रस मोहम्मद बिन सलमान ने फिर से खुलवा दिया। औरतों को उनके कई मानवीय हुकूक लौटा दिए गए, और अब तो वहां फैशन वीक के आयोजन तक होने लगे हैं। निस्संदेह, कट्टरपंथियों को यह सब रास नहीं आएगा, लेकिन पश्चिम एशिया अब बदलाव की ओर बढ़ चला है।
भारत हमेशा से सर्वधर्म समभाव की धरती रहा है। दुनिया के तमाम मजहबों की यहां मौजूदगी इसी बात की पुष्टि करती है। ऐसे में, अबू धाबी के मंदिर की खूबसूरत बात यह है कि एक मुस्लिम शासक ने इसके लिए जमीन दान में दी और इसकी एक दीवार ‘वॉल ऑफ हार्मोनी’ वोहरा समुदाय के दान से बनी है। जर्जर प्राचीन ढांचों की खातिर इंसानियत को कुर्बान करने पर आमादा लोगों के लिए यह एक सबक है कि संस्कृतियों के विस्तार के लिए समावेशी नजरिया चाहिए। धर्मों के बारे में तो सच यही है कि उनके आगे चुनौती उनसे जुड़े कट्टरपंथी ही अधिक पेश करते हैं। इसलिए आध्यात्मिक उपदेशकों के साथ-साथ शासकों की भूमिका अब काफी अहम हो चली है। अबू धाबी में मंदिर के निर्माण के पीछे भारतीय प्रधानमंत्री और यूएई के राष्ट्रपति की दूरदर्शिता बताती हैकि यदि नेकनीयती से कोई पहल की जाए, तो वह न सिर्फ फलीभूत होती है, बल्कि आदर्श भी गढ़ती है। आशा है, अबू धाबी के बाद अब पश्चिम एशिया के अन्य देश भी, जहां बड़ी संख्या में हिंदू धर्मावलंबी कार्यरत हैं, उनकी आस्था का ख्याल करेंगे। इस आकांक्षा का एक पहलू यह भी है कि भारत दुनिया को यह ठोस पैगाम देता रहा है कि उसकी सरजमीं पर किसी धर्म के उन्मादियों से कोई पक्षपात नहीं होता! अबू धाबी का मंदिर यही बता रहा है। 

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