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चंदे पर सवाल

क्या 15 दिन के भीतर सियासी दल अपने चुनावी बॉन्ड खरीदारों को वापस कर पाएंगे? ऐसे अनेक सवाल खड़े हो गए हैं, जिनसे राजनीतिक दलों को जूझना होगा। इलेक्टोरल बॉन्ड पर आया फैसला जितना प्रभावी है, उतना ही...

चंदे पर सवाल
Monika Minalहिन्दुस्तानThu, 15 Feb 2024 10:38 PM
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इलेक्टोरल बॉन्ड पर आया फैसला जितना प्रभावी है, उतना ही विचारणीय भी। सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों की पीठ ने गुरुवार को चुनावी बॉन्ड योजना को असांविधानिक करार दिया। भारतीय सियासत के लिए यह एक बड़ा फैसला है। आने वाले समय में न केवल इलेक्टोरल बॉन्ड के स्वरूप, बल्कि चुनावी चंदे के तौर-तरीकों में भी बदलाव आना तय है। वैसे सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड के किसी स्वरूप को बनाए रखने के लिए कोई विधिगत परिवर्तन करे, तो आश्चर्य नहीं। हालांकि, जब चुनाव करीब हैं, तब इसमें किसी भी तरह के परिवर्तन के लिए रास्ता संभव करना आसान नहीं है। फिलहाल, यह इतिहास में दर्ज हो चुका है कि भारत के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने पर्याप्त सुनवाई और विमर्श के बाद अपना दोटूक फैसला सुना दिया है। पीठ में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे, सभी ने इस योजना को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सर्वसम्मति से फैसले सुनाए हैं, अत: अदालत का रुख स्पष्ट रूप से सामने आ गया है। 
अदालत के अनुसार, राजनीतिक दल चुनावी प्रक्रिया में प्रासंगिक इकाइयां हैं। पारदर्शी निर्वाचन के लिए राजनीतिक दलों की फंडिंग की जानकारी बेहद जरूरी है। इस मोर्चे पर चुनावी बॉन्ड योजना सूचना के अधिकार और अनुच्छेद 19(1)(ए) के भी प्रतिकूल है। यह संदेह बहुत पुराना है कि राजनीतिक दल अगर चाहें, तो किसी काम के बदले किसी से चंदा ले सकते हैं। ऐसा नहीं है कि हर चंदे के पीछे ऐसी भावना होती है, पर कुछ चंदों पर इसलिए भी शंका होती है, क्योंकि धन लेने या देने वाले पर्याप्त पारदर्शिता से काम नहीं लेते हैं। मोटे तौर पर इलेक्टोरल बॉन्ड से शिकायत की भी यह बड़ी वजह है। न्यायालय चंदे के मामले में गोपनीयता के पक्ष में नहीं है। यह तथ्य है कि 2018 के बाद से गुमनाम दानदाताओं ने चुनावी बॉन्ड के माध्यम से भारत में राजनीतिक दलों को लगभग 16,000 करोड़ रुपये का योगदान दिया है। यहां इस बात के विस्तार में जाना बहुत जरूरी नहीं है कि ऐसी किसी भी योजना का सर्वाधिक लाभ सत्ताधारी पार्टी को होता है। साल 2013 के पहले कांग्रेस जब सत्ता में थी, तब उसके पास सर्वाधिक धन एकत्र होता था और वित्त वर्ष 2013-14 में भाजपा कुल 673.8 करोड़ रुपये के धन के साथ, कांग्रेस को मिले 598 करोड़ रुपये से आगे निकल गई। 
अब यहां से आगे की राह सरकार को निकालनी है। किसी भी लोकतंत्र में अधिक से अधिक पारदर्शिता की ओर बढ़ना सराहनीय ही कहा जाएगा। वैसे, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को मानना किसी भी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। जब चुनाव का एलान होना है, तब कोई भी दल अपने खजाने को घटाना नहीं चाहेगा। कुछ बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। जो लोग भारी-भरकम खर्च के साथ अपनी पार्टी को मैदान में जमाए हुए हैं, उनके लिए चिंता बहुत बढ़ गई है। क्या 15 दिन की वैधता अवधि के भीतर सियासी दल अपने चुनावी बॉन्ड खरीदारों को वापस कर पाएंगे? क्या भारत का चुनाव आयोग सूचना मिलने के एक सप्ताह के भीतर सभी चंदे या दान को सार्वजनिक कर पाएगा? नए चुनावी बॉन्ड पर रोक तो लग ही गई है, साथ ही, अब भारतीय स्टेट बैंक को 6 मार्च तक चुनाव आयोग में सभी विवरण जमा करने होंगे? तय है, आगे की राह किसी के लिए आसान नहीं है। 

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