Hindustan editorial column on 27 February - जिनपिंग का कार्यकाल DA Image

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जिनपिंग का कार्यकाल

कुछ ही महीने पहले जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग को देश के राष्ट्रपति के रूप में दुबारा चुना, तो कई जगह यह कहा गया कि वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में उतने ही ताकतवर हो गए हैं, जितने कि कभी माओ जेडांग थे। जबकि चीन की राजनीति के कई माहिरों का कहना था कि वह माओ से भी ज्यादा ताकतवर हो चुके हैं। ऐसे ही तमाम विश्लेषणों के बीच इस बात का जिक्र भी हुआ था कि शी के लिए माओ बनना आसान नहीं होगा, क्योंकि उनके माओ बनने की राह में सबसे बड़ी बाधा चीन का संविधान है। माओ ने जिस तरह चीन को दशकों तक अपने नियंत्रण में रखा, उस तरह शी नहीं रख सकते, क्योंकि देंग जियाओपिंग के जमाने में बना नया संविधान एक राष्ट्रपति को दो कार्यकाल से ज्यादा इस पद पर रहने की इजाजत नहीं देता। लेकिन अब लगता है कि शी ने भी माओ बनने की ठान ली है। उन्होंने इसकी बाधाओं को हटाने की तैयारी कर ली है। रविवार को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा कि अधिकतम दो कार्यकाल का प्रावधान संविधान से हटाया जा रहा है। शी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन भी हैं और पार्टी पर उनका किस तरह का नियंत्रण है, यह हम पिछले कुछ समय में देख ही चुके हैं। जाहिर है, संविधान संशोधन में कोई बाधा नहीं आने वाली है। इसी को देखते हुए यह कहा जाने लगा है कि शी जिनपिंग अब आजीवन चीन की बागडोर संभालेंगे। यह कहना अभी शायद जल्दबाजी होगी, लेकिन यह बदलाव अगले कुछ साल या कुछ दशक के लिए चीन की दिशा तो तय कर ही देगा।

माओ के निधन के बाद जिस तरह से चीन में राजनीतिक उथल-पुथल हुई थी, उसे देखते हुए ही नए संविधान में दो कार्यकाल वाला यह प्रावधान डाला गया था। तब उम्मीद व्यक्त की गई थी कि यह चीन को स्थिरता देगा। देंग जियाओपिंग के बाद हू जिंताओ भी दो कार्यकाल तक ही देश के सर्वेसर्वा रहे। वे दो दशक चीन की राजनीति और समाज के लिए बदलाव के दो बहुत बडे़ दशक थे। उन्होंने न सिर्फ चीन को आधुनिक विश्व पूंजी से जोड़ा, बल्कि उसे एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में तैयार किया। शी जिनपिंग ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया है। लेकिन दिलचस्प यह है कि अब जब इस प्रावधान को हटाने की बात कही जा रही है, तो वही तर्क दिया जा रहा है, जो इस प्रावधान को लाते समय दिया गया था- स्थिरता का तर्क। कहा जा रहा है कि इससे चीन में स्थिरता और निरंतरता आएगी। 

हम जिस अर्थ में दुनिया में लोकतंत्र को देखते हैं, चीन में उस तरह का लोकतंत्र नहीं है। चीन के नेताओं को वहां की जनता प्रत्यक्ष रूप से नहीं चुनती और अप्रत्यक्ष तरीका भी इतना जटिल है कि आम जनता की राजनीति में कोई सक्रिय दिलचस्पी नहीं होती। चीन की इस व्यवस्था को हम निरंकुश भले ही न कहें, लेकिन उसमें तानाशाही के बहुत सारे तत्व हैं। चीन का यह तंत्र व्यवस्थापरक तंत्र है। देंग की भूमिका यही थी कि उन्होंने व्यक्तिपरक तंत्र को व्यवस्थापरक तंत्र में बदला था। लेकिन अब शी जिनपिंग जिस तरह से ताकतवर हो गए हैं कि चीन के तंत्र पर यह खतरा फिर मंडराने लगा है कि वह व्यक्तिपरक तंत्र में न बदल जाए। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि चीन की अर्थव्यवस्था किस रफ्तार से बढ़ती है और फिर शी और उनकी पार्टी चीन के अंतरविरोधों को किस हद तक काबू में रख पाते हैं?

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  • Web Title:Hindustan editorial column on 27 February