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संपादकीयमतदाता की परिपक्वता

हिन्दुस्तानPublished By: Shankar
Fri, 25 Oct 2019 01:04 AM
मतदाता की परिपक्वता

चुनाव में मतदाता जब वोट देते हैं, तो वे सिर्फ उम्मीदवारों को जिताते या हराते नहीं है, वे उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों को स्पष्ट संदेश भी देते हैं। महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखें, तो यह संदेश स्पष्ट सुना जा सकता है। पूरे चुनाव के दौरान और मतदान के बाद तक यह माना जा रहा था कि दोनों ही राज्यों में भारतीय जनता पार्टी जोरदार ढंग से सत्ता में वापसी करेगी। यहां तक कि मतदान बाद के तमाम सर्वेक्षण भी यही कह रहे थे। ऐसे नतीजों पर पहुंचना सबके लिए बहुत आसान भी था। सत्ताधारी दल के पास गिनाने के लिए पांच साल के कार्यकाल की बहुत सारी उपलब्धियां थीं। यही हर चुनाव में होता है और अंतिम नतीजे इस पर निर्भर करते हैं कि विपक्ष उसके दावों को खारिज करने में किस हद तक कामयाब हो पाता है। महाराष्ट्र और हरियाणा, दोनों ही जगह के विधानसभा चुनावों को लेकर तमाम विश्लेषकों में इस बात पर आम सहमति जैसी दिख रही थी कि इस बार विपक्ष का नैरेटिव बहुत कमजोर है। कई कारणों से विपक्ष हतोत्साहित दिख भी रहा था। हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा और महाराष्ट्र में शरद पवार परिवार अपनी राजनीति के कारण कम और अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों के कारण सुर्खियों में ज्यादा दिख रहा था। इन्हीं हालात में मतदाता ने संदेश दिया है कि उसे कमजोर विपक्ष पसंद नहीं है।

महाराष्ट्र में तो खैर भाजपा और शिव सेना की सरकार पहले की तरह ही चलती रहेगी, हरियाणा में त्रिशंकु विधानसभा है, सरकार किसकी बनेगी, अभी यह भविष्यवाणी संभव नहीं, लेकिन दोनों ही राज्यों में मतदाताओं ने मजबूत विपक्ष का आधार तैयार कर दिया है। महाराष्ट्र में सत्ताधारी गठजोड़ के पास स्पष्ट बहुमत है, लेकिन संख्या बल इतना ज्यादा नहीं रह गया कि विपक्ष की आवाज दब जाए। वैसे यह भी सच है कि पिछले पांच साल के दौरान विपक्ष की भूमिका ज्यादा अच्छी तरह से भाजपा की सहयोगी शिव सेना ने ही निभाई, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के गठजोड़ ने नहीं। हरियाणा में विपक्ष इस दौरान अंदरूनी झगड़ों और घटकवाद में ही उलझा दिखाई दिया। दिलचस्प यही है कि इन हालात के बाद भी जनता ने विपक्ष को मजबूत बनाने का रास्ता चुना। महाराष्ट्र में तो खैर सत्ता नहीं बदली और हरियाणा में भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, मगर इसका एक अर्थ यह भी है कि मतदाताओं में बदलाव की कोई बड़ी इच्छा नहीं थी, पर उसने विपक्ष को एक बड़ी भूमिका जरूर सौंप दी है। अब यह विपक्ष पर है कि वह जनता के इस विश्वास को किस तरफ ले जाता है।

दोनों ही राज्यों में भाजपा ने प्रचार का मुख्य मुद्दा कश्मीर और अनुच्छेद 370 को बनाया। ये दोनों ही ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर देश भर में आम सहमति है और यह समय-समय पर दिखी भी है। राष्ट्रीय स्तर पर इसे केंद्र सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि भी कहा जा सकता है। दोनों ही राज्यों के नतीजों ने बता दिया है कि चुनावी मुद्दों के रूप में ऐसी उपलब्धियों के इस्तेमाल की एक सीमा है। राज्य के चुनाव में मतदाता के लिए ये शायद उतने बड़े मुद्दे नहीं हैं। स्थानीय समस्याओं, मंदी और बेरोजगारी ऐसे मौकों पर उनके फैसलों को ज्यादा प्रभावित करते हैं। मतदाताओं ने राजनीतिक दलों को सिर्फ संदेश ही नहीं दिया, अपनी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय भी दे दिया है।
 

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