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उलटी पड़ती चाल

उसकी चाल अब उलटी पड़ने लगी है। भारत ने जब अपने संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाया, तो पाकिस्तान ने इसे खुद के लिए एक अवसर माना था। उसे लग रहा था कि इसके जरिए वह कश्मीर समस्या का अंतरराष्ट्रीयकरण कर लेगा। इसलिए वह अगस्त के शुरू में ही सक्रिय हो गया था। उसके हंगामे में वह चीन भी मददगार था, जिसे पाकिस्तान अपना सदाबहार दोस्त कहता है। मगर उसकी बदकिस्मती है कि यह जुगलबंदी बहुत ज्यादा नहीं चली। सबसे पहले चीन ने इस मसले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाया। उसे वहां ज्यादा समर्थन न मिलना इस बात का पहला सुबूत था कि पाकिस्तान की दाल अब ज्यादा नहीं गलने वाली। हालांकि इसके बाद भी उसने इसे दुनिया भर में और खासकर विभिन्न मंचों पर उठाना जारी रखा। जैसे, पिछले दिनों उसने इस मसले को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक में उठाया। खैर, पाकिस्तान की इन्हीं कोशिशों से यह मुद्दा दुनिया भर की चर्चा में तो आ ही गया, लेकिन यह चर्चा ही पाकिस्तान को भारी पड़ने लगी है। यूरोपीय संसद में जो हुआ, वह बताता है कि कश्मीर का मुद्दा उठाने के चक्कर में पाकिस्तान ने दुनिया भर को अपनी आलोचना का एक मौका भी दे दिया है।

ब्रसेल्स में चल रहे यूरोपीय संसद के सत्र में जिस तरह से यह मामला उछला, उसे देखते हुए पाकिस्तान को फिर से अपनी करनी पर सोचना चाहिए। सुरक्षा परिषद और मानवाधिकार परिषद में तो यह मुद्दा पाकिस्तान की कोशिशों से उठा था, लेकिन यूरोपीय संसद में कुछ सांसदों ने इसे अपने तईं उठाया और फिर वहां पाकिस्तान की जितनी कड़ी आलोचना हुई, उतनी तो कहीं और नहीं हुई थी। इन सांसदों ने पाकिस्तान से आतंकवाद को शह देने से बाज आने का कहा। एक टिप्पणी यह थी कि जम्मू-कश्मीर में जो आतंकवादी हैं, वे कहीं चांद से नहीं टपके, बल्कि पाकिस्तान से ही भेजे जा रहे हैं। इन सांसदों ने जो कहा, उसमें दो बातें स्पष्ट थीं। पहली यह कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाना भारत का आंतरिक मामला है, और दूसरा यह कि कश्मीर का मसला भारत और पाकिस्तान का आपसी मसला है, इसे दोनों देशों को आपस में ही हल करना होगा, इसके लिए किसी अंतरराष्ट्रीय प्रयास की जरूरत नहीं है। जब यूरोपीय संसद में यह बहस चल रही थी, उसी समय संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भारत के इस नजरिए पर मोहर लगा दी कि यह मसला भारत और पाकिस्तान को आपसी बातचीत से सुलझाना होगा। गुटेरेस ने यह बात उस सवाल के जवाब में कही, जो कुछ पाकिस्तानी पत्रकारों ने उनसे पूछा था। उधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कश्मीर को इस्लाम का मुद्दा बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं। अभी तक वह इसमें नाकाम ही रहे हैं। अब इसके लिए वह सऊदी अरब जा रहे हैं। हालांकि वहां भी उनकी दाल गलने की उम्मीद कम ही है।

जैसे-जैसे पाकिस्तान की चाल उलटी पड़ती जा रही है, भारत की जिम्मेदारी भी बढ़ती जा रही है। कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करना और उसे विकास की मुख्यधारा में लाना, ये दो ऐसी चुनौतियां हैं, जो अब सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इसलिए भी कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद यह सबसे बड़ी जरूरत है, और इसलिए भी कि अब वह मौका है, जब हमें दुनिया के भरोसे पर खरा उतरना होगा।
 

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