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उल्टी पड़ती चाल

भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा खत्म करने से विश्व राजनय के कई समीकरण बदल गए हैं। इन्हीं में एक बड़ा बदलाव भारत-पाकिस्तान संबंध और कश्मीर की समस्या को देखने के दुनिया के नजरिये में आया है। पिछले दिनों यह मसला उस समय विवाद में आ गया था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि भारतीय प्रधानमंत्री ने उनसे कश्मीर मामले में मध्यस्थता का आग्रह किया था। भारत की तरफ से इसका जोरदार खंडन उसी समय हो गया था। भारत की यह पुरानी नीति रही है कि कश्मीर समस्या को भारत-पाकिस्तान की आपसी बातचीत से ही सुलझाया जाएगा और इसमें किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं होगी। इसे लेकर दोनों देशों के बीच शिमला समझौता भी हो चुका है और बाद में लाहौर घोषणा में भी इसे दोहराया गया। इसलिए इस बात की कोई संभावना नहीं थी कि भारत के प्रधानमंत्री या कोई भी अन्य प्रतिनिधि ऐसी बात कहेगा।

हालांकि बाद में पता लगा कि यह बात मुख्य रूप से पाकिस्तान को खुश करने के लिए कही गई थी। अमेरिका जल्द ही अपनी फौज को अफगानिस्तान से वापस बुलाना चाहता है और इसके लिए वह इन दिनों तालिबानी गुटों से बात भी कर रहा है, अमेरिका को पता है कि यह काम वह पाकिस्तान की मदद के बिना नहीं कर पाएगा। पर जब जोरदार खंडन हो गया, तो खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहा कि मध्यस्थता का मामला फिलहाल उनकी मेज पर नहीं है, और जब तक दोनों देश नहीं चाहेंगे, मध्यस्थता का कोई सवाल नहीं है। अब इसी बात को एक बार फिर भारत के राजदूत हर्षवर्द्धन श्रिंगला ने दोहराया है, तो इसके साथ ही यह बात भी जोड़ दी है कि खुद अमेरिका की दशकों पुरानी नीति यही रही है कि कश्मीर मसले पर मध्यस्थता नहीं होगी।

अमेरिका के एक समाचार चैनल से बातचीत में भारतीय राजदूत का यह बयान उस समय और महत्वपूर्ण हो गया, जब कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की बात करने वाला पाकिस्तान खुद इसकी सीमाओं को समझने लगा। संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के भारत के फैसले के बाद शुरू में पाकिस्तान यही कहता रहा कि वह इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाएगा और भारत को अलग-थलग करने की कोशिश करेगा, लेकिन अब उसके सुर भी बदलने लगे हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी का वह बयान काफी महत्वपूर्ण है, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया है कि संयुक्त राष्ट्र से उन्हें बहुत ज्यादा मदद नहीं मिलने वाली है। उन्होंने यह भी कहा कि इस्लामी देश भी इस मामले में भारत का विरोध करेंगे, इसकी बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है। चीन खुद अभी हांगकांग को लेकर परेशानी में है। ऐसे में, पाकिस्तान इस सदाबहार दोस्त से भी उम्मीदें खोता जा रहा है।

भारत ने अपना कदम तब उठाया है, जब पाकिस्तान आतंकवाद के मामले में काफी गहरे तक फंसा हुआ है। एक तरफ, उसकी आर्थिक हालत काफी खस्ता है, तो दूसरी तरफ, आतंकवाद की फाइनेंसिंग के मामले में वह ग्रे सूची से बाहर आने के लिए छटपटा रहा है। इस धारणा को पूरी दुनिया अपनाती जा रही है कि कश्मीर का आतंकवाद उसी की देन है। इसीलिए भारत ने जब जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किया है, तो पाकिस्तान खुद को ही अलग-थलग पा रहा है।

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column on 14th August