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नवाज की राजनीति खत्म

यह फैसला पाकिस्तान का राजनीतिक इतिहास बदलकर रख देगा। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे किसी भी इंसान के आजीवन चुनाव लड़ने या सार्वजनिक पद पर बने रहने की संभावना खत्म कर दी है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 62(1)(एफ) के तहत अयोग्य ठहराया गया हो। यानी इस फैसले के बाद देश के तीन बार प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ की राजनीति में वापसी की सारी उम्मीदें खत्म हो गई हैं। वह न तो कभी चुनाव लड़ सकेंगे, न कोई सार्वजनिक पद संभाल सकेंगे, यानी अपनी पार्टी के अध्यक्ष भी नहीं बन सकेंगे। 68 वर्षीय नवाज शरीफ को सुप्रीम कोर्ट ने पनामा पेपर लीक मामले में नाम आने के बाद बीते साल 28 जुलाई को प्रधानमंत्री पद के अयोग्य ठहराया था, जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। फैसला नावाज शरीफ के साथ ही पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के नेता जहांगीर तरीन पर भी लागू होगा, जिन्हें इन्हीं प्रावधानों के तहत 15 दिसंबर को अयोग्य ठहराया गया था।
फैसला इस मामले में नायाब लग सकता है कि इसने भ्रष्टाचार के ढेर पर बैठे पाकिस्तान जैसे मुल्क को नई राह दिखाई है। उन कयासों को धता बताई है, जो नवाज की जोड़-तोड़ के कायल थे और मान रहे थे कि तमाम विपरीत हालात को धता बताने वाले शरीफ इस बार भी इससे बाहर आ जाएंगे। पाकिस्तान के कई प्रधानमंत्री इससे पहले भी विपरीत हालात में हटे हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के मामले में किसी प्रधानमंत्री या बड़े नेता के हटने का यह पहला मामला था। पहली बार एक सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री और उसके परिवार को अपनी आय के स्रोतों पर जनता के सामने सफाई देनी पड़ी। इसीलिए वहां इसे राजनेताओं व सरकारी सेवकों के बीच पारदर्शिता कायम करने के दबाव की शुरुआत भी माना जा रहा है। लेकिन इसका एक पहलू और भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। पाकिस्तान में बीते दिनों न्यायपालिका ने जैसी अतिसक्रियता दिखाई है, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उसके खतरनाक संकेत हैं। वैसे भी, वहां कभी न्यायपालिका सक्रिय होती है, तो कभी सेना। लोकतांत्रिक सत्ता तो सबसे निचले पायदान पर हुआ करती है। पनामा पेपर लीक से निकली न्यायिक और सिविल सोसाइटी की सक्रियता कुछ मायनों में जरूर स्वागतयोग्य है, लेकिन बेहतर यही होता कि भविष्य तय करने का फैसला जनता चुनाव के जरिए करती।  
देश में आम चुनावों की आहट के बीच आए इस फैसले की कई व्याख्याएं होंगी। ऐसे वक्त मेें, जब नवाज की सबसे बड़ी उम्मीद उनकी बेटी मरियम नवाज खुद इसी मामले में मुसीबत में हों, तो यह नवाज और उनकी पार्टी के लिए कठिन चुनौती की घड़ी है। जाहिर है, नवाज तो फैसले के खिलाफ जन-समर्थन लेने की कोशिश करेंगे। ऐसे में, भाई और पीएमएल-एन के अध्यक्ष शहबाज शरीफ को अपने लिए उनसे अलग राग छेड़ना आसान नहीं होगा। रोचक पहलू यह भी है कि यह मुसीबत खुद नवाज शरीफ की ही बुलाई हुई है। जब संविधान संशोधन से इस अनुच्छेद को ही खत्म करने की बात आई थी, तब उन्होंने संसद की बजाय कोर्ट का रुख करना बेहतर समझा था। यही उनके लिए भारी पड़ा। वैसे जिस पनामागेट मामले में हमारे देश के बड़े-बड़े नाम आने के बावजूद अभी तक कोई सुनगुन भी न दिखी हो, पाकिस्तान की अदालत ने वहां की तस्वीर बदलने वाला फैसला सुना दिया है।
    
 

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  • Web Title:hindustan editorial column on 14 april