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तूफान के बाद

इसका नामाकरण भले ही ‘वायु’ हुआ हो, लेकिन यह एक ताकतवर चक्रवाती तूफान है, विनाश की तमाम आशंकाओं को समेटे हुए। जिस समय आप ये पक्तियां पढ़ रहे हैं, ‘वायु’ गुजरात और महाराष्ट्र के तटों से टकरा चुका है। महाराष्ट्र के एक हिस्से, गुजरात के 408 तटवर्ती गांवों और दमन द्वीप समूह पर जहां इसका खतरा सबसे ज्यादा है, वहां से विनाश की तस्वीरें आने में अभी समय लगेगा, लेकिन माना यही जा रहा है कि यह चक्रवाती तूफान उतना खतरनाक नहीं है, जितना पिछले महीने ओडिशा में आया तूफान ‘फानी’ था।

ओडिशा का पिछला तूफान हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण था। एक तो यह ऐसे समय में आया, जब देश में चुनाव प्रक्रिया चल रही थी और ओडिशा में तो आम चुनाव के साथ-साथ विधानसभा चुनाव भी हो रहे थे। उस चक्रवाती तूफान के दौरान वहां सभी दलों ने राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों के अपने तूफान को कुछ दिनों के लिए रोक लिया था, ताकि प्रशासन तूफान का ठीक से मुकाबला कर सके। और यही हुआ भी। इसी के साथ राज्य और केंद्र ने सहयोग का भी एक अच्छा उदाहरण पेश किया। बेशक तूफान से होने वाले बहुत से नुकसान को नहीं रोका जा सकता था, लेकिन पहले की तुलना में पिछले महीने के तूफान में जान-माल की हानि बहुत कम हुई थी। उस तूफान के सबक इस बार गुजरात में काफी काम आ रहे हैं। ओडिशा की तरह ही इस बार भी प्रभावित इलाकों के गांवों को समय रहते खाली करा लिया गया। आपदा के प्रभाव को कम करने की जरूरी मुस्तैदी इस बार भी काम आती दिख रही है।

प्राकृतिक आपदाओं से निपटने का दरअसल यही तरीका होता है। कुदरत के कुछ कहर ऐसे होते हैं, जिन्हें हम सीधे तौर पर तो नहीं रोक सकते, लेकिन ऐसे इंतजाम जरूर कर सकते हैं कि विनाश कम से कम हो। बाकी आपदाओं के मामले में भले ही अभी ऐसा नहीं कहा जा सकता हो, लेकिन चक्रवाती तूफान की आपदा के प्रबंधन में हमने जो कामयाबी हासिल की है, वह बहुत बड़ी बात है। लेकिन ऐसा हर जगह नहीं हुआ है। अभी कुछ ही महीने पहले केरल के पर्वतीय क्षेत्र में आई भयानक बाढ़ के समय हमने देखा था कि वहां समय रहते आपदा प्रबंधन के इंतजाम लोगों तक नहीं पहुंच सके थे। इसलिए अब जरूरी यह है कि इस सबक को आगे बढ़ाया जाए और अन्य तरह की आपदाओं के प्रबंधन में कुशलता हासिल की जाए। पूरी दुनिया का पिछले कुछ साल का अनुभव यही बताता है कि जैसे-जैसे पर्यावरण में बदलाव हो रहा है, प्राकृतिक आपदाओं का आना बढ़ गया है। यहां तक कि अमेरिका जैसे देश भी इसके प्रभावों को कम करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जरूरी यह है कि हर जगह यह मानकर तैयारियां की जाएं कि आपदा कहीं भी, कभी भी आ सकती है।

‘वायु’ के आगमन का एक नुकसान यह भी हुआ है कि केरल से जो मानसून तेजी से उत्तर की ओर बढ़ रहा था, उसका बढ़ना रुक गया है। आगे की यात्रा वह अब पांच दिन बाद ही शुरू करेगा। वैसे भी इस बार मानूसन आठ दिन की देरी से आया है और इसके फिर से अटक जाने का अर्थ है कि एक तो इसके कमजोर होने की आशंकाएं इस बार पहले से ज्यादा होंगी और दूसरी बरसाती फसलों की बुआई व रोपाई में देरी होगी। अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित करने वाली ये कुछ ऐसी आपदाएं हैं, जिनसे निपटने की तैयारी हमें हमेशा रखनी होगी।

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column on 13th June