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ईद से बंधी उम्मीद

यह तर्क दिया जा सकता है कि कश्मीर घाटी में इस बार ईद उल अजहा की वह रौनक नहीं थी, जो इस मौके पर हर बार वहां होती थी। लेकिन सच शायद इसके विपरीत है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में इस पर्व को लेकर जो आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं, स्थानीय जनता ने उन आशंकाओं को ध्वस्त कर दिया। यह सच है कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद स्थानीय जनता की वास्तविक प्रतिक्रिया क्या है, यह हम अभी ठीक से नहीं जान पाए हैं, लेकिन सोमवार को धारा-144 में दी गई ढील के बावजूद कहीं से हिंसक प्रतिक्रिया या किसी बड़े प्रतिरोध की खबर न आना बताता है कि स्थानीय लोग केंद्र सरकार के इस फैसले का तीखा विरोध नहीं कर रहे हैं। जो छिट-पुट घटनाएं घटीं भी, वे भी तुरंत ही नियंत्रण में आ गईं।

हालांकि जिस दिन केंद्र सरकार ने यह फैसला किया था, उस दिन से ऐसी आशंकाएं हवा में थीं कि ईद के मौके पर जब सुरक्षा में ढील दी जाएगी, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है। इसे लेकर खुद सरकार भी काफी सतर्क थी। शायद इन्हीं आशंकाओं के चलते केंद्र सरकार के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल खुद श्रीनगर में थे और उन्होंने कश्मीर के कई इलाकों का दौरा भी किया। ऐसी खबरें भी हैं कि नमाज के तुरंत बाद प्रशासन ने लोगों को अपने घर जाने के लिए कह दिया। जाहिर है, यह कदम इस एहतियात में उठाया गया होगा कि सुरक्षा की ढील अगर लंबी चली, तो कुछ लोग इसका नाजायज फायदा उठाने की कोशिश भी कर सकते हैं।

बहरहाल ईद का शांतिपूर्ण ढंग से बीत जाना पूरे देश के लिए तो एक अच्छी खबर है ही, साथ ही केंद्र सरकार ने भी इससे राहत की सांस ली होगी। वैसे इसका एक कारण यह भी कहा माना जा रहा है कि सरकार इस समय कश्मीर में फूंक-फूंककर कदम रख रही है, इसके अलावा उसने कई एहतियाती कदम भी उठाए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उन रास्तों को बंद करने की कोशिश की कई है, जिनसे स्थानीय जनता को भड़काया जा सकता है। इनमें संचार नेटवर्क और इंटरनेट आदि को बंद करना भी शामिल है। क्षेत्र के 400 से ज्यादा अलगाववादी और राजनीतिक नेताओं को हिरासत में लिए जाने को भी हम चाहें, तो इसी नजरिये से देख सकते हैं।

कुछ भी हो, लेकिन यह मौका शांति से, आसानी से और बिना किसी बुरी खबर के बीत गया है, जिसे लेकर सबसे ज्यादा आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं। बेशक आगे की राह आसान नहीं है। अभी जो एहतियाती कदम उठाए गए हैं, उन्हें देर-सवेर वापस लेना ही पडे़गा। न धारा-144 अनंतकाल तक के लिए लागू रखी जा सकती है और न ही संचार नेटवर्क पर पाबंदी। जल्द ही जम्मू-कश्मीर की नई विधानसभा के चुनाव होंगे और उसके पहले राजनीतिक दलों के नेताओं को भी छोड़ना होगा। जहां तक अलगाववादी नेताओं की बात है, तो ऐसे जिन भी नेताओं को सीधे तौर पर आतंकी और हिंसक वारदात में लिप्त नहीं पाया गया, उन्हें सरकार ने कभी लंबे समय तक जेल में नहीं रखा। यही वह समय होगा, जब सीमा पार से भी चिनगारियां भड़काने और घी डालने का काम किया जाएगा। सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसी समय खड़ी होगी। लेकिन मौजूदा तथ्य यही है कि ईद के शांतिपूर्ण ढंग से गुजर जाने ने भविष्य के लिए एक बड़ी उम्मीद बंधाई है।

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column on 13th August