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संपन्नता और रोग

बहुत सी व्याधियां हैं, जो वापस लौटती हैं, कई बार हमारे भ्रम को तोड़ने के लिए और कई बार याद दिलाने के लिए कि हम लापरवाह होते जा रहे हैं। पोलियो को हम पूरी दुनिया से अभी तक नहीं मिटा पाए, प्लेग के किस्से भी मुड़-मुड़कर आते रहते हैं, लेकिन चेचक को लोग भूलते जा रहे हैं। कम से कम भारत में तो भूल ही चुके हैं। बेशक, इसका कारण वह वैक्सीनेशन है, जिसका टीका आजकल बच्चे को पैदा होने के कुछ महीने के भीतर ही आवश्यक रूप से लगा दिया जाता है। न इसकी चर्चा सुनाई देती है और न इसके आंकड़े ही सामने आते हैं। सरकारी भाषा में कहें, तो हमने चेचक का पूरी तरह से उन्मूलन कर दिया है।

वैसे चेचक के उन्मूलन का दावा करने वाला भारत अकेला देश नहीं है। यह काम दुनिया के बहुत सारे देशों में, बल्कि दुनिया के ज्यादातर हिस्से में हो चुका है। मसलन, चिकित्सा सुविधाओं के मामले में दुनिया के सबसे अग्रणी देशों में से एक अमेरिका में यह काम सन 2000 में ही हो गया था। तब यह दावा किया गया था कि अब वहां चेचक का कोई मरीज नहीं बचा। लेकिन अभी दो दशक भी नहीं बीते और जो खबरें आ रही हैं, वे चौंकाने वाली हैं। 2019 के पहले कुछ महीनों में ही वहां चेचक के 1,172 मामले सामने आ चुके हैं। इनमें से 124 मरीजों को तो इसकी वजह से अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।

अमेरिका के प्रतिष्ठित संस्थान सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल का कहना है कि ज्यादातर मामलों में यह रोग उन लोगों को हुआ, जिन्होंने चेचक का टीका नहीं लगावाया था। हमारे यहां जब इस तरह की कोई दिक्कत खड़ी होती है, तो हम मानते हैं कि या तो इसका कारण अशिक्षा है, गरीब व अनपढ़ लोग अन्य प्राथमिकताओं की वजह से या फिर पर्याप्त जागरूकता न होने की वजह से टीका नहीं लगवाते, इसलिए इसके शिकार बन जाते हैं; या फिर इसका कारण दूर-दराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव भी माना जाता है। लेकिन अमेरिका के बारे में ये तर्क नहीं दिए जा सकते। जागरूकता को लेकर विवाद हो सकता है, पर निरक्षरता और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध होनेे जैसे तर्क वहां नहीं चलेंगे।

सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के आंकडे़ बताते हैं कि इनमें से 75 फीसदी मामले दुनिया के सबसे आधुनिकतम और संपन्न शहर न्यूयॉर्क और उसके आस-पास के हैं। यह जीवाणु इसी आधुनिकता के बीच में फैल रहा है। या फिर यूं भी कह सकते हैं कि इसी आधुनिकता और संपन्नता के बीच वह प्रवृत्ति भी पनप रही है, जो वैक्सीनेशन जैसी जरूरी चीजों के प्रति या तो लापरवाह है, या उसके बारे में जानती ही नहीं। वहां नियम है कि अगर कोई आवश्यक वैक्सीनेशन नहीं करवाता, तो उसे इसके लिए एक हजार डॉलर तक जुर्माना देना पड़ सकता है।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इस साल जनवरी में जिस इलाके में यह सबसे ज्यादा फैला, उनमें ज्यादातर अति-परंपरावादी यहूदी समुदाय की बस्तियां हैं। अभी यह साफ नहीं है कि इस समुदाय के कोई आग्रह उसे टीकाकरण से रोक रहे थे या कोई अन्य कारण है। हमारे यहां पोलियो के मामले में भी देखा गया कि अफवाहों से पैदा हुए कुछ आग्रह लोगों को पोलियो उन्मूलन अभियान से रोकते रहे। अमेरिकी मामला आधुनिक और संपन्न देशों के बारे में हमारा भ्रम तोड़ता है। सिर्फ आर्थिक विकास ही सामाजिक जागरूकता की गारंटी नहीं है।

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column on 12th August