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मरीज के अधिकार

यह एक जरूरी कानून का मामला भी है और उसे लागू करने में हुई अनावश्यक देरी का भी। सोमवार से लागू एचआईवी-एड्स कानून कई तरह से महत्वपूर्ण है। यह इस रोग के पीड़ितों को कई अधिकार तो देता ही है, साथ ही उनके प्रति नफरत फैलाने या उससे भेदभाव को आपराधिक कृत्य ठहराता है। यह एक जरूरी कानून था, जिसे संसद ने पिछले साल मार्च में ही पास कर दिया था। यानी अब जब यह लागू हो रहा है, तो इस बीच पूरा डेढ़ साल का समय बीत गया है। सरकारी अनुमान के अनुसार, भारत में एड्स के करीब 21 लाख मरीज हैं और उन्हें कई स्तरों पर न सिर्फ भेदभाव का सामना करना पड़ता है, बल्कि अपमानजनक स्थितियों से भी गुजरना पड़ता है। यहां तक कि ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब पूर्वाग्रहों और कम जानकारी के कारण अस्पतालों के कर्मचारी तक उन्हें हाथ लगाने से इनकार कर देते हैं। ऐसे कानून से हम यह उम्मीद तो नहीं कर सकते कि उनसे समाज की मानसिकता रातोंरात बदल जाएगी और लोगों के पूर्वाग्रह पूरी तरह खत्म हो जाएंगे, लेकिन यह कानून पीड़ितों को पूर्वाग्रहों और भेदभाव से लड़ने का हथियार तो देता ही है।

यह भी सच है कि पिछले कुछ साल में दुनिया भर में एचआईवी और एड्स को लेकर सोच काफी बदली है। यह ठीक है कि इसका न तो अभी तक पूर्ण इलाज निकला है और तमाम कोशिशों के बावजूद न ही इसकी ही इसकी कोई वैक्सीन तैयार हो सकी है। इतना भर हुआ है कि इसके लिए एंटी रेट्रोवायरल इलाज जरूर विकसित हो चुका है, जो पीड़ित में रोग को पूरी तरह खत्म तो नहीं करता, लेकिन उसके जीवन को बचा सकता है। साथ ही, यह भी सच है कि एड्स अब उतना बड़ा हौआ नहीं रहा, जितना कि इसे कुछ साल पहले तक मान लिया गया था। दुनिया की बहुत सी संस्थाएं इसे लेकर सक्रिय हो गई थीं और यहां तक भविष्यवाणी कर दी गई थी कि भारत की 20 फीसदी तक आबादी इससे पीड़ित हो सकती है। इन्हीं सबके कारण स्वास्थ्य सेवाओं के बहुत सारे संसाधन एड्स की रोकथाम और इसके बारे में जागरूकता फैलाने में खपा दिए गए थे। लेकिन ये सारी आशंकाएं गलत साबित हुईं और अब तो यह कहा जा रहा है कि पूरी दुनिया में एड्स रोगियों की संख्या में 33 फीसदी तक कमी आ गई है। इसके बावजूद जो कानून लागू हुआ है, उसकी सख्त जरूरत थी और दरअसल इसे कई साल पहले ही बन और लागू हो जाना चाहिए था।

वैसे एड्स अकेला ऐसा रोग नहीं है, जिसके पीड़ितों को भेदभाव और अपमान का सामना करना पड़ता हो। किसी जमाने में ऐसी स्थिति कुष्ट रोग को लेकर भी थी। इसके रोगियों को समाज से दूर ले जाया जाता था। बाद में बाबा आम्टे, मदर टेरेसा जैसे कई समाज सुधारकों ने इसके मरीजों के बीच काम किया और लोगों की मानसिकता को बदला, जिससे इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सका। अब एचआईवी और एड्स के लिए तो कानून बन गया है, लेकिन हमें इससे आगे बढ़कर सोचना होगा। जरूरत एक ऐसे व्यापक कानून की है, जो किसी भी रोग के पीड़ित के मानवाधिकारों की रक्षा करता हो, और उसे वही हैसियत देता हो, जो देश के किसी भी दूसरे नागरिक को प्राप्त है। इसके साथ ही जरूरत जन-स्वास्थ्य के ढांचे को मजबूत बनाने की भी है, रोगों की प्रभावी रोकथाम भी हो और रोगियों को समुचित इलाज भी मिले। 

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  • Web Title:hindustan editorial column on 12 september