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माफी की भावना

यह दुनिया के इतिहास का एक दुखद अध्याय है। जलियांवाला बाग नरसंहार के सौ साल बाद अब जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, वे भले ही थोड़ी राहत देती हों, लेकिन दुखों पर मरहम का काम करने लायक  अभी भी नहीं हैं। बावजूद इसके कि इस बीच पूरी एक सदी का वक्त बीत गया। इसी साल 13 अप्रैल को जब इस नरसंहार की सौवीं बरसी का आयोजन था, उससे ठीक तीन दिन पहले ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने इस कांड पर अपनी संसद में खेद जरूर व्यक्त किया था, लेकिन इसमें ब्रिटिश सरकार की ओर से माफी मांगने जैसी कोई बात नहीं थी। यहां यह याद रखना जरूरी है कि ब्रिटिश सरकार माफी मांगे, इसका आग्रह 1920 से ही लगातार किया जाता रहा है। यानी पूरे 99 साल बाद भी माफी नहीं मांगी गई, जबकि इस बीच कई ब्रिटिश प्रधानमंत्री, ब्रिटेन के राजकुमार और खुद महारानी जलियांवाला बाग जा चुकी हैं।

इस लिहाज से केंटरबरी के आर्कबिशप जस्टिन बेल्बे ने वहां जाकर और दंडवत होकर जो माफी मांगी है, वह भी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं है। हालांकि वह ब्रिटेन की माफी का विकल्प नहीं है। ब्रिटिश सरकार से माफी की मांग इसलिए की जाती रही है कि इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले कर्नल डायर ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि थे और उसी की सेवा में वहां हो रहे कांग्रेस के जलसे में कानून-व्यवस्था की स्थिति देखने के लिए गए थे। केंटरबरी के आर्कबिशप चर्च ऑफ इंग्लैंड के मुखिया हैं, जो वहां की सबसे प्रमुख धार्मिक-सामाजिक संस्था है। उन्होंने जलियांवाला बाग में यह स्वीकार भी किया कि ‘मैं ब्रिटेन या उसकी सरकार या फिर इतिहास की तरफ से माफी नहीं मांग सकता, मैं इतना ही कह सकता हूं कि जो हुआ, मैं उससे निजी तौर बहुत दुखी हूं।’ इतना ही नहीं, वहां की विजिटर बुक में उन्होंने ‘भारी शर्म के एहसास’ का जिक्र भी किया। 

तकरीबन डेढ़ हजार निहत्थे लोगों की जान लेने वाले इस नरसंहार के जो घाव भारतीय मानस और इतिहास पर हैं, उसके लिए शायद ही कोई माफी प्रभावी मरहम साबित हो सके। लेकिन इनका एक संदेश तो हो ही सकता है कि एक समाज, एक देश यह महसूस कर रहा है कि उसकी एक पीढ़ी ने जो किया, वह किसी भी तरह से गलत था। बाद में उस नरसंहार के नतीजों का विश्लेषण करते हुए कई इतिहासकारों ने स्वीकार किया है कि यह नरसंहार इतिहास का वह मोड़ था, जहां से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का अंतिम इतिहास लिखा जाना शुरू हो गया।

यह तर्क दिया जा सकता है कि अब एक सदी बाद माफी का कोई अर्थ नहीं है। बात अपने आप में सही हो सकती है, पर ऐसी माफी भी महत्वपूर्ण होती है। इतिहास में जो क्षति हुई, उसकी भरपाई अब किसी तरह से नहीं हो सकती, मगर माफी का एक अर्थ होता है पश्चाताप, यानी गलती को स्वीकार करना और एक आश्वासन कि अब फिर ऐसा नहीं होने दिया जाएगा। अतीत का तो कुछ नहीं हो सकता, पर माफी हमें भविष्य की उम्मीद जरूर दे सकती है। यह मामला सिर्फ भारत और ब्रिटेन के बीच का नहीं है। जलियांवाला बाग नरसंहार जब हुआ, तब पूरी दुनिया न सिर्फ हमारे दुख में शामिल हुई थी, बल्कि उसने बहुत कुछ सीखा भी था। इसके पश्चाताप से भी दुनिया सीखेगी, दुनिया में फिर कोई जलियांवाला बाग कांड न हो, इसके लिए भी यह जरूरी है।

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  • Web Title:hindustan Editorial column on 12 September