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अब अदालत से उम्मीद

मेडिकल कॉलेजों के विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिले से संबंधित नीट-यूजी 2024 के परीक्षा का मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है और अदालत ने इस परीक्षा की आयोजक संस्था ‘एनटीए’ व केंद्र से जवाब-तलब करते...

अब अदालत से उम्मीद
Monika Minalहिन्दुस्तानTue, 11 Jun 2024 09:48 PM
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मेडिकल कॉलेजों के विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिले से संबंधित नीट-यूजी 2024 के परीक्षा का मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है और अदालत ने इस परीक्षा की आयोजक संस्था ‘एनटीए’ व केंद्र से जवाब-तलब करते हुए जो टिप्पणी की है, उससे इस मामले की गंभीरता समझी जा सकती है। आला अदालत ने दोटूक शब्दों में कहा है कि ‘परीक्षा की पवित्रता प्रभावित हुई है और हमें इसका जवाब चाहिए।’ दरअसल, इस प्रवेश-परीक्षा के दिन ही इसके प्रश्न-पत्र के लीक होने के आरोप तेजी से उछले थे, पर तब एनटीए ने तमाम आरोपों को खारिज करते हुए परीक्षा को दोषमुक्त बताया था। मगर जिस तरह से समय से पहले परिणाम घोषित करने और ‘ग्रेस मार्क्स’ देने का विवाद सामने आया है, उसने इस परीक्षा की शुचिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस परीक्षा की तैयारी में देश के 24 लाख से अधिक नौजवान रात-दिन एक कर रहे थे, जिसमें उनके अभिभावकों का काफी श्रम और संसाधन लगा हुआ था, उसकाआयोजन तो इतना पारदर्शी व दोषरहित होना चाहिए था कि सभी हितधारक उसकी शपथ उठाते। मगर दुर्योग से वे अपने को छला हुआ महसूस कर रहे हैं और अब आखिरी उम्मीद के तहत अदालत की शरण में हैं।     
सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षा परिणाम के बाद की दाखिला संबंधी प्रक्रिया पर रोक न लगाने का फैसला किया है, तो इसके पीछे यही दृष्टिकोण है कि चयनित विद्यार्थियों के हितों की अनदेखी न हो। इसमें तो कोई दोराय नहीं कि किसी भी कदाचार के लाभार्थी बहुत थोड़े से लोग होते हैं, मगर उससे अहित व्यापक समूह और समाज का होता है। सवाल सिर्फ नीट-यूजी 2024 की परीक्षा का ही नहीं है, एक के बाद दूसरी परीक्षाओं के मामले जिस तरह अदालत में पहंुच रहे हैं, उससे अभ्यर्थियों में निराशा का भाव गहरा सकता है। अभी कितने दिन हुए हैं, जब कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल में 23,000 से अधिक शिक्षकों व सहायकों की नियुक्ति को रद्द कर दिया था? करीब आठ वर्षों की सेवा के बाद अचानक वे सभी सड़क पर आ गए और सुप्रीम कोर्ट से फौरी राहत के बाद अंतिम निर्णय की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे हैं। जिस देश में बेरोजगारी की समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी हो, वहां ऐसी अनिश्चितता के कितने घातक परिणाम हो सकते हैं, इस पर सरकारों और सिस्टम को गंभीरता से गौर करने की जरूरत है।
राज्यों की प्रवेश परीक्षाओं में धांधली कोई नई परिघटना नहीं है, लेकिन केंद्रीय स्तर की परीक्षाओं में ऐसी शिकायतें न के बराबर रही हैं। यूपीएससी की परीक्षाएं इसकी सबसे बड़ी नजीर हैं। केंद्र को यह सुनिश्चित करने की दरकार है कि नीट-यूजी परीक्षा को लेकर इस बार जैसे विवाद पैदा हुए हैं, उनकी पुनरावृत्ति न हो। तब तो और, जब तमिलनाडु जैसे राज्य नीट परीक्षा से मुक्ति के लिए विधानसभा से विधेयक पारित कर चुके हों। इस तरह के विवाद केंद्रीकृत प्रवेश परीक्षा के सरकार के मनसूबे को पलीता लगा सकते हैं। इन सबसे बढ़कर ये परीक्षार्थियों और उनके अभिभावकों के लिए मानसिक यंत्रणा की तरह हैं। एनटीए और सरकार को अपने तईं इस पर त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए थी। आम चुनाव के कारण सरकार इस स्थिति में नहीं थी, मगर तंत्र के आगे तो ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी! इसलिए सुनिश्चित किया जाए कि नीट अभ्यर्थी अपनी परीक्षा व्यवस्था से संतुष्ट रहें और उन्हें परीक्षा के बाद अदालतों की खाक न छाननी पड़े! 

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