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बाजार के संकेत

आर्थिक मोर्चे से एक बुरी खबर है। स्कूटर, मोटर साइकिल समेत सभी तरह की मोटर गाड़ियों की बिक्री काफी तेजी से नीचे आ गई है। अप्रैल यानी वर्तमान वित्त वर्ष के पहले महीने में इन गाड़ियों की बिक्री इतनी कम हुई है कि ऑटो बाजार की मंदी का आठ साल पुराना रिकॉर्ड टूट गया है। कारोबार में कमी न सिर्फ सभी तरह की गाड़ियों में हुई है, बल्कि लगभग सभी कंपनियों की बिक्री पर बाजार के इस रुझान का असर दिखा है। इस दौरान सबसे ज्यादा गिरावट स्कूटरों की बिक्री में देखी गई है, इनका कारोबार 26 प्रतिशत तक नीचे आ गया है। यही हाल कारों का भी है, जिसकी बिक्री 20 फीसदी घटी है।

मोटर साइकिल का कारोबार भी 12 फीसदी घटा है। पिछले कुछ समय से देश में एसयूवी का बाजार काफी तेजी से बढ़ रहा था, लेकिन अब इसमें भी गिरावट दर्ज हो रही है। और सबसे बड़ी बात यह है कि इस दौरान व्यावसायिक वाहनों की बिक्री में भी तेज गिरावट दिखाई दी है। यही हाल तिपहिया वाहनों का भी है। इस गिरावट का एक तत्काल असर तो यह है कि वाहन विक्रेताओं के यहां अनबिके वाहनों का ढेर लग गया है, जो जल्द ही एक बड़ी दिक्कत का कारण बन सकता है। जल्द ही वाहनों के पर्यावरण मानक बदलने वाले हैं। अभी जो वाहन बाजार में बिक रहे हैं, वे बीएस-5 स्तर के हैं, जैसे ही बीएस-6 स्तर के मानक लागू होंगे, विक्रेता इन पुराने वाहनों को नहीं बेच पाएंगे। इस बाजार के सामने एक और दिक्कत यह है कि बीएस-6 के बाद वाहनों की कीमतें और बढ़ानी पड़ेंगी, डर है कि इससे बिक्री और कम हो सकती है।

समस्या वाहनों की बिक्री कम होने को लेकर नहीं है, समस्या उन कारणों को लेकर है, जो इस रुझान के पीछे दिख रहे हैं। वाहन हमारे देश में मध्यवर्ग के लिए प्रतिष्ठा, उसकी समृद्धि के सूचक रहे हैं। पिछले कई दशक से वाहनों का बढ़ता बाजार मध्यवर्ग के विस्तार और उससे निचले वर्गों की तरक्की की कहानी भी कहता रहा है। बेशक ये बढ़ते वाहन सड़कों पर प्रदूषण और जाम बढ़ाने का काम भी करते हों, लेकिन उनकी संख्या का लगातार बढ़ते जाना यह तो बताता ही रहा है कि अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में सब कुछ ठीक चल रहा है। जाहिर है, बिक्री का गोता लगा जाना यह बता रहा है कि गड़बड़ी शुरू हो गई है। खासकर व्यावसायिक वाहनों की बिक्री में कमी यह बता रही है कि बाजार को माल के लदान के लिए ज्यादा वाहनों ही जरूरत नहीं महसूस हो रही।

जाहिर है कि यह मामला ऑटोमोबाइल बाजार भर का नहीं है, बल्कि मसला यह है कि पूरी अर्थव्यवस्था भी कहीं न कहीं गोते लगा रही है। यह गिरावट किन-किन स्तरों पर है, यह पूरी तरह स्पष्ट होने और कारण समझने में शायद थोड़ा समय लगे, पर चीजें उस ओर जाती दिख रही हैं, जिन्हें अर्थशास्त्र की भाषा में मंदी कहा जाता है। हीरो मोटर कॉर्प के पवन मुंजाल का यह बयान गौर करने लायक है कि उनकी आधी से ज्यादा बिक्री ग्रामीण क्षेत्रों में होती है और बाजार का सबसे बुरा हाल वहीं है। इसका एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि मंदी का यह मामला कुछ हद तक खेती-किसानी के आर्थिक संकट से भी जुड़ रहा है। इस सबका एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक अर्थ यह भी हुआ कि चंद रोज बाद केंद्र में जो भी नई सरकार बनेगी, उसकी सबसे बड़ी चुनौती पहले ही तैयार हो गई है।

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column May 15