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काशी और मथुरा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन की सराहना करते हुए वाराणसी और मथुरा में हिंदू पक्षों के दावों का समर्थन करके जहां अपने मंतव्य को स्पष्ट किया है, वहीं...

काशी और मथुरा
Monika Minalहिन्दुस्तानThu, 08 Feb 2024 09:26 PM
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन की सराहना करते हुए वाराणसी और मथुरा में हिंदू पक्षों के दावों का समर्थन करके जहां अपने मंतव्य को स्पष्ट किया है, वहीं समाज में आधिकारिक स्तर पर एक विमर्श को भी जन्म दिया है। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में मुख्यमंत्री का यह भाषण अनेक अर्थों में कालजयी है, जिसमें समय परिवर्तन की गूंज भी निहित है। ऐसे भाषण की कल्पना पहले असंभव थी। एक नए उभरते भारत के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में धर्मस्थलों और मंदिरों के शहरों के प्रति लगाव नई दशा और दिशा का सूचक है। मुख्यमंत्री ने राम मंदिर के निर्माण में बाधा डालने के लिए विपक्षी दलों की भी आलोचना की है और साथ ही, उन पर राजनीतिक लाभ के लिए आक्रमणकारियों का महिमामंडन करने का भी आरोप लगाया है। मंदिर बहुल शहरों के विकास पर ध्यान देना प्रशंसनीय है और इसमें संदेह नहीं कि यह काम पहले भी हो सकता था। धार्मिक महत्व के ज्यादातर शहर बुनियादी सुविधाओं के अभाव और गंदगी से बहुत परेशान रहे हैं। अत: अब अगर इस विषय पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, तो स्वागतयोग्य है। 
राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में अपने दूसरे कार्यकाल के लगभग मध्य में मुख्यमंत्री ने वाराणसी में ज्ञानवापी और मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान की मुक्ति की ओर साफ संकेत किया है। द्वापर में महाभारत से बचने के लिए श्रीकृष्ण ने कौरव सभा में महाराजा धृतराष्ट्र से पांडवों के लिए पांच गांव मांगे थे, ठीक वैसे ही मुख्यमंत्री ने निवेदन किया कि आज हिंदू समाज आस्था के केवल तीन केंद्र मांग रहा है। आधिकारिक रूप से विधानसभा में की गई यह मांग न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि इसका व्यापक असर हमारे समाज पर आने वाले दिनों में दिखाई पड़ सकता है। वैसे समुदाय विशेष पहले इस तरह की मांग को एकाधिक बार खारिज कर चुका है। जब प्रधानमंत्री पद पर चंद्रशेखर बैठे थे, तब भी और प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के समय भी यह निवेदन चर्चा में आया था, पर अब तक ऐसे निवेदनों को बहुमत से ठुकराने का इतिहास ही जगह-जगह दर्ज है। तीन भगवान के नाम पर तीन स्थान अगर दे दिए जाते, तो किसी धर्मस्थल को जबरन ढहाने की नौबत शायद न आती। सवाल यह है कि क्या अब समुदाय विशेष में कुछ देने की भावना आएगी? क्या व्यापक समाज में बहुमत के प्रति आदर का भाव आएगा? 
राज्यसभा सांसद व राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय  में इशारा किया है कि सद्भाव के लिए बहुसंख्यक समाज यह भूल जाए कि उसके साथ अत्याचार हुआ था और अल्पसंख्यक समुदाय यह भूल जाए कि उसने इस देश पर कभी राज किया था। चूंकि यह सदिच्छा पूरी नहीं हुई है, इसलिए हिन्दुस्तान में सद्भाव की गाड़ी अक्सर पटरी से उतर जाती है। सांप्रदायिकता की बुनियाद पर हमारा बंटवारा भी हो चुका है, मगर अब कतई नहीं। हर समुदाय को तर्क, तथ्य और हालात को समझते हुए आगे बढ़ना होगा। कुछ अच्छी बुनियादी बातों को दिल से लगाए रखने की जरूरत है। अब 6 दिसंबर कभी न लौटे, अदालत और परस्पर संवाद से हल निकले, किसी के हाथों में नफरत की तलवार न आए। एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर तेजी से बढ़ते उत्तर प्रदेश की राह में उपद्रव का एक भी अवरोधक न उभरने पाए, ताकि हम अनुभव करें कि रामलला नए भवन में आए हैं, तो राम भाव भी आया है।

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