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वित्तीय अविश्वास

आर्थिक उदारीकरण के दौर में वित्तीय सेवाओं का सुगम और पारदर्शी होना एक बुनियादी जरूरत है। इसी पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने पेटीएम पेमेंट्स बैंक लिमिटेड को फास्टैग सेवा के लिए...

वित्तीय अविश्वास
Monika Minalहिन्दुस्तानFri, 16 Feb 2024 08:49 PM
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आर्थिक उदारीकरण के दौर में वित्तीय सेवाओं का सुगम और पारदर्शी होना एक बुनियादी जरूरत है। इसी पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने पेटीएम पेमेंट्स बैंक लिमिटेड को फास्टैग सेवा के लिए 30 अधिकृत बैंकों की सूची से हटाकर तमाम वित्तीय संस्थाओं को पारदर्शिता बरतने के लिए जो संदेश दिया है, वह स्वागत-योग्य है। किसी भी कंपनी को अपने नियामक के अनुरूप ही काम करना चाहिए, मगर ऐसा लगता है कि निशाने पर आए पीटीएम ने कहीं न कहीं कोताही बरती है और इसीलिए उसे कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। ध्यान देने की बात है कि अब पूरे देश में फास्टैग सुविधा की व्यवस्था हुई है, जिसका लाभ प्रतिदिन करोड़ों लोगों को होता है। देश भर में स्थित साढ़े आठ सौ से ज्यादा टोल गेट या टोल नाकों या टोल प्लाजा से जितने भी लोग गुजरते हैं, उन्हें नकदी रखने की मजबूरी से मुक्ति मिल चुकी है और ज्यादातर टोल गेट पर जेब टटोलने या वाहन से बाहर हाथ निकालने और खुदरा पैसों के लिए बहस करने की जरूरत नहीं रह गई है। यात्रा का आनंद बढ़ा है।
हालांकि, इसमें कोई दोराय नहीं कि फास्टैग को सफल बनाने में पेटीएम की भी भूमिका रही है, पर अब जो समस्या खड़ी हुई है, उससे निपटने के लिए खुद इस कंपनी को बड़ी पहल करनी पड़ेगी। इस कंपनी के क्रिया-कलापों से भारतीय रिजर्व बैंक प्रसन्न नहीं है और उसने 31 जनवरी को पेटीएम पेमेंट्स बैंक पर व्यावसायिक प्रतिबंध लगाए हैं। इस कंपनी को कहा गया है कि उसका बैंक 29 फरवरी के बाद कोई जमा स्वीकार न करे और कर्ज लेन-देन भी न करे। इस कंपनी को पहले ही चेत जाना चाहिए था, भारतीय केंद्रीय बैंक ने मार्च 2022 में ही उसके बैंक को नए ग्राहक जोड़ने से रोक दिया था। भारतीय रिजर्व बैंक की मर्जी से ही देश में तमाम वित्तीय संस्थाओं को काम करना चाहिए और किसी भी संस्था को मनमानी करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। जो कंपनी नियमों की पालना नहीं कर रही है, उसे कारोबार से रोकना गलत नहीं है और इसी दिशा में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने कदम उठाया है।  
यह डिजिटल का दौर है और इस दौर में विश्वसनीयता की जरूरत ज्यादा बढ़ गई है। लोग लाखों रुपये का आदान-प्रदान एक क्लिक या एक बटन से करने लगे हैं। यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि डिजिटल के विस्तार के साथ ही, धोखाधड़ी की आशंकाएं भी बढ़ी हैं। धोखाधड़ी में साइबर लुटेरे ही नहीं, बल्कि बड़ी संस्थाएं भी लगी हुई हैं। वित्तीय मोर्चे पर ज्यादा सुविधा दरअसल लोगों को लापरवाह भी बना देती है और अक्सर लोभी प्रवृत्ति के लोगों के साथ ठगी हो जाती है। अत: अगर कोई संस्था बैंकिंग क्षेत्र में सेवा देना चाहती है, तो उसे पूरी तरह से चाक-चौबंद होकर ही बाजार में उतरना चाहिए। बैंकिंग क्षेत्र का विगत वर्षों में बहुत विस्तार हुआ है, अनेक कंपनियां बैंकों की तरह व्यवहार या कारोबार करने लगी हैं, पर क्या उन्हें पूरी तरह से जिम्मेदार बनाए रखने के इंतजाम पर्याप्त हैं? भारत में बैंकिंग धोखाधड़ी को लेकर ज्यादा चिंता स्वाभाविक है। वित्तीय वर्ष 2023 में बैंकिंग प्रणाली में कुल 13,530 धोखाधड़ी के मामले दर्ज किए गए हैं। कुल रिपोर्ट किए गए धोखाधड़ी के मामलों में से लगभग 49 प्रतिशत डिजिटल भुगतान-कार्ड/इंटरनेट श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। अत: डिजिटल आधारित बैंकिंग की दुनिया में सौ फीसदी विश्वसनीयता बनाकर ही हमें आगे बढ़ना चाहिए। 

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