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संबोधन की रोशनी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्र के नाम संदेश जितना सामयिक था, उतना ही आवश्यक भी था। जब देश बड़े बदलाव के मोड़ पर है, तब सरकार को सावधानियों में रत्ती भर कमी भी नहीं छोड़नी चाहिए। प्रधानमंत्री द्वारा किया गया संवाद भी एक सावधानी है, जिसकी आने वाले दिनों में बार-बार जरूरत पड़ेगी। जम्मू-कश्मीर से जुड़ा निर्णय भले ही झटके से अवतरित हुआ है, लेकिन अब उतने ही सावधान कदमों से चलते हुए इसके सुप्रभावों को विकसित और दुष्प्रभावों को खत्म करना होगा। अव्वल तो इसमें कोई शंका नहीं कि प्रधानमंत्री ने देश के बहाने जम्मू-कश्मीर को संबोधित किया है।

कुछ देर से सही, लेकिन यह संबोधन एक ऐसी सुबह की तरह है, जिसकी रोशनी न केवल कश्मीर घाटी के तमाम आंतरिक-बाह्य अंधेरों में, बल्कि उन तमाम लोगों के दिलों में भी उतरनी चाहिए, जिन पर कश्मीर की महती जिम्मेदारी है। तीन दशकों के खून-खराबे में जिस जमीन पर हजारों शव गिरे हों, वहां विनम्र संवाद ही मानवीयता है। प्रधानमंत्री के संदेश में भी यह मानवीयता, स्नेह और कश्मीरियों को और पास खींच लेने का सद्प्रयास महसूस हुआ है, तो कोई आश्चर्य नहीं। प्रधानमंत्री जानते हैं, इस ऐतिहासिक निर्णय की लाज तभी बचेगी, जब कश्मीर घाटी में भारत और भारतीयता के प्रति लगाव का नया युग शुरू होगा।

संदेश में जो शब्द और भाव थे, उनकी आशा केवल एक भारतीय प्रधानमंत्री से ही की जा सकती है। दुनिया में ऐसे कई इलाके हैं, जहां के नेता खुद को ताकतवर दर्शाने और शत्रुओं को दबाने के लिए ऐसे अवसरों पर बहुत तीखे शब्दों और जहरीले भावों का उपयोग करते हैं। लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री के संबोधन के सभी पहलुओं की जब विवेचना होगी, तो उसमें सबके लिए चिंता नजर आएगी। कश्मीर के कर्मचारियों, कारोबारियों, जवानों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं और यहां तक कि नेताओं की भी उन्हें चिंता है। तभी तो प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा फिर मिल जाएगा, केंद्र शासित क्षेत्र के रूप में उसकी पहचान स्थाई नहीं रहेगी। भारत के लोग यही चाहेंगे कि प्रधानमंत्री का यह स्पष्टीकरण जम्मू-कश्मीर के तमाम नेताओं को अमन-चैन की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करे। जम्मू-कश्मीर में नई दिल्ली सीधे राज नहीं करेगी, यहां जल्दी ही स्थानीय प्रतिनिधि चुने जाएंगे और स्थानीय मुख्यमंत्री ही शासन चलाएंगे। यह भी साफ हो गया कि कश्मीर में सियासत की बुनियाद बदल चुकी है और अब बदली हुई अच्छी जम्हूरियत का इंतजार है।

प्रधानमंत्री ने फिर दोहराया कि जम्मू-कश्मीर में शिक्षा, रोजगार, विकास की बहुत जरूरत है, यह तभी तेज होगा, जब अमन-चैन होगा। भारत की जो खासियत है, जियो और जीने दो, सबका साथ-सबका विकास, आज इन नारों को साबित करने की जरूरत आन पड़ी है। जरूरी है कि संदेश घाटी के उन 70 लाख कश्मीरियों के लिए मरहम का काम करे, जो तनाव और नफरत के जख्मों से परेशान हैं। प्रधानमंत्री के इस वादे को हकीकत बनाने की जरूरत है कि ‘हम धरती के स्वर्ग को आतंकवाद से मुक्त कराएंगे।’ अब हम सबके सामने दूसरी कोई राह या राजनीति बची भी नहीं है। अब तो दुनिया के सामने भारतीय स्नेह और अनुशासन से यह सिद्ध करने की चुनौती है कि दुनिया में यदि स्वर्ग कहीं है, तो यहीं है।

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column August 10