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राजनीति में भलमनसाहत

चुनाव के मौसम में एक नेता का दूसरे नेता के बारे में अपशब्द कहना जितना आसान और दुखद है, उतना ही दुर्लभ और सुखद है एक नेता का दूसरे नेता से हालचाल पूछना। राजनीति में चुनाव को चोट करने का समय माना जाता है। जो दूसरे को ज्यादा से ज्यादा चोट पहुंचा सकता है, वही असली चुनावी वीर है। प्रचलित राजनीति में कहा जाता है, विरोधियों को वार करने का मौका न दें। विरोधियों को जहां पाएं, वहीं निपटाएं। आरोप के जवाब में प्रत्यारोप, आलोचना के जवाब में अपशब्द और फिर बदले का सिलसिला। बहरहाल, बीच चुनाव में कुछ अहम प्रश्न खड़े हो रहे हैं, क्या भारतीय राजनीति में एक-दूसरे के प्रति मानवीय भावनाओं का प्रदर्शन कमजोरी है?

क्या भारतीय राजनीति विपक्षियों के लिए केवल बुरे की कामना करती है? यह किसी खुशी से कम नहीं है कि भारतीय राजनीति के उत्तरोत्तर स्याह होते चेहरे को रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपनी भलमनसाहत से थोड़ा साफ किया है। वह अस्पताल में भर्ती घायल पूर्व विदेश राज्य मंत्री व कांग्रेस नेता शशि थरूर का हाल जानने अस्पताल पहुंच गईं। चुनाव के समय में केवल छत्तीस का आंकड़ा पाले बैठे अनेक लोगों और नेताओं को अजीब लगा होगा, लेकिन वास्तव में यही मानवीयता का तकाजा है कि शारीरिक या व्यक्तिगत कष्ट के समय सभ्य मानवों को साथ खड़े होना चाहिए। जहां जितना संभव हो, किसी के दुख में साथ खड़े होना सभ्यता की निशानी है। 

बेशक, किसी को अपशब्द कहना, किसी के लिए द्वेष रखना भी हिंसा ही है। जो लोग बांटने, चरित्रहनन करने और अपशब्दों की राजनीति करते हैं, उन पर लगाम लगनी ही चाहिए। चुनाव आयोग को इस बात पर गौर करना चाहिए कि किसी भी चुनाव से देश और खराब होकर न निकले। सही चुनाव वही है, जिससे देश पहले से ज्यादा सुधरा हुआ महसूस हो। चुनाव आयोग को कतई मूकदर्शक नहीं बनना चाहिए। उसने कुछ नेताओं के खिलाफ जो जरूरी सांकेतिक कार्रवाई की है, उसका स्वागत हर भारतीय को करना चाहिए। 

नेताओं के लिए चुनाव दबाव और तनाव का समय है, लेकिन उन्हें अपशब्द, असभ्यता, दुव्र्यवहार, गलत उद्धरण, विद्वेष, भेदभाव फैलाने की छूट नहीं दी जा सकती। खुशी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट अब चुनाव आयोग की शक्ति बढ़ाने पर विचार करेगा। चुनाव आयोग के पास शक्तियां अभी भी हैं, लेकिन उन शक्तियों को ज्यादा विस्तृत, व्यवस्थित और प्रभावी बनाने की जरूरत है, ताकि आवश्यकता के समय चुनाव आयोग साहस के साथ लोकतंत्र और संविधान के हित में तत्काल फैसला ले सके।

ऐसा सशक्त चुनाव आयोग जरूरी है, जो उन नेताओं को सबक सिखाए, जो चुनाव में असली मुद्दों से भटककर न केवल अनर्गल बोलने लगते हैं, बल्कि व्यक्ति व समाज को तोड़ने-बांटने-अपमानित करने लगते हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए, इस समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू देश के लोग भी हैं। कुछ अध्ययन यह बताते हैं, नेता चर्चा में रहने या आने के लिए अनर्गल या अपशब्द कहते हैं। अत: इस मोर्चे पर समाज की जिम्मेदारी बनती है कि वह नेताओं के ऐसे बयानों की हर संभव तरीके से निंदा करे और ऐसे नेताओं को सबक सिखाए। सचेत रहें, हम देश के लोग सभ्य राजनीतिक संस्कृति निर्माण का काम केवल राजनेताओं पर नहीं छोड़ सकते। 

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column April 17