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संपादकीय

दाग भरी सरकार

हिन्दुस्तानPublished By: Manish Mishra
Wed, 08 Sep 2021 11:21 PM
दाग भरी सरकार

अफगानिस्तान में तालिबान ने अपनी अंतरिम सरकार का एलान कर दिया। जो सरकार बनने जा रही है, उसे लेकर ज्यादा आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जो लोग अमेरिका से बीस साल से लड़ रहे थे, वे सत्ता में नहीं आएं और अपनी जगह किन्हीं दूसरे नेताओं को सत्ता संभालने का मौका दें, यह कैसे संभव होता? जो लोग बेहतर या साफ-सुथरी या बेदाग सरकार की उम्मीद कर रहे थे, उनके भोलेपन को जमीनी जवाब मिल चुका है। तालिबान की समर्थक आईएस हो या आईएसआई, दोनों में से कोई नहीं चाहेगा कि अभी तक के लड़ाकू नेतृत्व को हटाकर उदार नेतृत्व की तलाश की जाए। सत्ता परिवर्तन के आधुनिक युग में अगर मध्ययुग अपनी बर्बरता के साथ कूद आया है, तो उसे एक हद तक व्यवहार लायक बनाए रखने में ही भलाई है। विरोध तो तब करना चाहिए था, जब अमेरिका ने इन्हीं लोगों में कथित अच्छा तालिबान देखा था और सत्ता हस्तांतरण की दोहा वार्ता शुरू हुई थी। अब जो भी सरकार जैसे भी वहां बनेगी, उस सरकार को मान्यता भले न दी जाए, लेकिन कमोबेश महत्व तो देना पड़ेगा। 
यह हमारे समय का स्याह सच है कि तालिबान की अंतरिम सरकार में कम से कम 14 सदस्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकी सूची में रहे हैं। प्रधानमंत्री घोषित मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद, उनके दोनों डिप्टी और गृह मंत्री भी सूची में शामिल हैं। इनामी आतंकी सिराजुद्दीन को गृह मंत्री बनाया गया है, तो उनके चाचा हक्कानी को शरणार्थियों की जिम्मेदारी दी गई है। जो लोग सरकार संभालेंगे, उनके नाम दुनिया आगे उनके काम के मुताबिक जानेगी, लेकिन फिलहाल यह जान लेना जरूरी है कि एक सरकार बन रही है, जिसमें रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री तक प्रतिबंधित सूची में रहे हैं। अंतरिम कैबिनेट के तमाम 33 सदस्यों को लेकर दुनिया में चिंता जाहिर की जा रही है। दरअसल, यही लोग थे, जो अमेरिकी सेना और अफगानियों पर छिपकर आतंकी हमले करते थे, तो यह सवाल लोगों के दिमाग में स्वत: आएगा कि क्या इन लोगों की आदत रातोंरात छूट जाएगी। इन नए नेताओं को अपने स्थापित चरित्र से अलग तमाम अफगानियों को साथ लेकर चलते हुए दुनिया को दिखाना पड़ेगा। इस सरकार में कोई महिला नहीं है, तो चिंता और बढ़ जाती है। 
चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को भी सावधान रहना होगा। क्या ये दोनों देश तालिबान की नई सरकार को व्यावहारिक बना पाएंगे? हालांकि, एक बड़ी चिंता यह भी है कि तालिबान भी एकमत नहीं हैं और पूरे अफगानिस्तान में उनकी तूती नहीं बोलती है। पंजशीर घाटी में संघर्ष जारी है, वहां से अलग सरकार के गठन की खबर भी आ रही है। पंजशीर घाटी में तालिबान के खिलाफ विद्रोही गुट का नेतृत्व कर रहे अहमद मसूद की तरफ से कहा गया है कि हम यहां एक वैध और ट्रांजिशनल प्रजातांत्रिक सरकार बनाएंगे। यह अपने आप में खुशी की बात है कि अफगानिस्तान में कोई प्रजातंत्र के बारे में सोच रहा है, पर इस सोच का सामना संगीनों से है। अफगानिस्तान में स्थिर सरकार के लिए इंतजार करना पड़ सकता है। किसी भी देश को वाजिब वैधता उसकी सरकार के व्यवहार से हासिल होती है। फिलहाल, दुनिया के तमाम आशावादी लोग तो उस मुल्ला अखुंद से भी उम्मीद रखेंगे, जो बामियान के बुद्ध को तोप से उड़ाने में शामिल रहे हैं।

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