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30 मार्च, 2020|12:06|IST

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ट्रस्ट पर भरोसा

अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट की घोषणा न केवल स्वागतयोग्य है, बल्कि एक तरह से सबक भी है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और निर्देशित प्रक्रिया के तहत मंदिर निर्माण की दिशा में कदम-दर-कदम शांतिपूर्वक बढ़ने का अपना विशेष महत्व है। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संसद में की गई श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की घोषणा का सभी को इंतजार था। इस फैसले को लोग भले ही दिल्ली के विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखेंगे, लेकिन वास्तव में यह घोषणा न्यायालय के दिशा-निर्देशों के तहत ही हो रही है। 9 नवंबर, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या मामले में अपना अंतिम फैसला सुनाया था। फैसले के तहत तीन महीने में केंद्र सरकार को मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट की स्थापना करनी थी। चूंकि मियाद पूरी होने जा रही है, इसलिए प्रधानमंत्री की ताजा घोषणा के वैधानिक महत्व को समझा जा सकता है।

ट्रस्ट का गठन जरूरी है, ताकि उसके अधीन मंदिर का निर्माण शुरू हो। अब ट्रस्ट के सदस्यों का चयन जितनी जल्दी होगा, उतना ही अच्छा होगा। ट्रस्ट गठन से मंदिर निर्माण की राजनीति पर भी लगाम लगेगी। यह अच्छी बात है कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद लगातार सद्भाव बना रहा है और आगे भी सरकार को सुनिश्चित रखना होगा कि अनुचित लाभ कोई न ले सके। बुधवार को संसद में प्रधानमंत्री ने भी सबको साथ लेकर चलने के अपने संकल्प को जिस तरह से दोहराया है, उन्हें उसी धारा में आगे का सफर तय करना चाहिए। 9 नवंबर के फैसले के बाद प्रधानमंत्री ने कहा था कि यह किसी की जीत या हार नहीं है। इसी भावना के अनुरूप मंदिर निर्माण होना चाहिए। देश इतिहास लिख रहा है, तो यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्माण की बुनियाद में किसी तरह की राजनीति, वैमनस्य और सांप्रदायिकता का लेशमात्र भी न हो।

प्रधानमंत्री की घोषणा के साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि 15 सदस्यीय ट्रस्ट में एक दलित सदस्य भी होगा। वाकई ट्रस्ट में हर समुदाय और जाति के ऐसे विशेषज्ञों व संतों को चुना जाना चाहिए, जिनकी ईमानदारी व राम भाव के प्रति निष्ठा प्रश्नों से परे हो। साथ ही यह भी देखना चाहिए कि ट्रस्ट में किसी खास समूह, अखाड़े या मठ या संप्रदाय का वर्चस्व न रहे। मंदिर वही लोग बनाएं, जो हृदय में राम भाव रखते हों। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र को एक ऐसा अन्न क्षेत्र भी घोषित करना चाहिए, ताकि राम के दरबार से किसी जाति, धर्म, संप्रदाय का कोई भी व्यक्ति बिना प्रसाद न लौटे।

सरकार को कम और ट्रस्ट को ज्यादा सचेत रहना होगा कि राजनीति की कोई गुंजाइश न रहे। भारत में लिया गया यह फैसला इतना बड़ा है कि पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है। दुनिया यह देखना चाहती है कि जिस राम के लिए लंबा संघर्ष चला, उस राम को यहां के लोग वस्तुत: कितना मानते हैं। अत: जितने प्रेम से मंदिर निर्माण हो, उतने ही लगाव से मस्जिद बनाई जाए। जिस सद्भाव की उम्मीद मंदिर ट्रस्ट से रहेगी, वही भाव लोग उस वक्फ बोर्ड में भी देखना चाहेंगे, जिसे अयोध्या में भव्य मस्जिद का निर्माण करना है। स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा ट्रस्ट की घोषणा भी एक अच्छा संकेत है कि वह अपने स्तर पर इस मामले को सीधे देख रहे हैं। भारत इस समय ऐसे दौर में है, जब हम रत्ती भर भी सांप्रदायिक गलती कर नहीं सकते।

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column 6th February 2020