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19 जनवरी, 2021|7:17|IST

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वायरस के साथ जिंदगी

इन दिनों एक वाक्य खूब दोहराया जा रहा है कि असाधारण परिस्थितियों से निपटने के उपाय भी असामान्य होते हैं। इसीलिए दुनिया भर के साइंसदां कोविड-19 से निपटने के लिए जिस स्तर पर रिसर्च कर रहे हैं और इसके संक्रमण को रोकने के लिए वैक्सीन बनाने में जुटे हैं, वह अभूतपूर्व है। एक अच्छी खबर यह भी है कि तकरीबन छह टीकों का इंसानों पर परीक्षण शुरू हो गया है। ये परीक्षण तीन स्तरीय होते हैं। मगर अब विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेष प्रतिनिधि डॉक्टर डेविड नाबारो ने जो कहा है, वह दुनिया भर की सरकारों, स्वास्थ्य संगठनों और लोगों के लिए चिंता के साथ-साथ गहन विचार का विषय होना चाहिए। डॉ डेविड के मुताबिक, हम पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि कोविड-19 की वैक्सीन तैयार हो ही जाएगी और यदि हो भी गई, तो गुणवत्ता व सुरक्षा की कसौटी पर वह सौ फीसदी खरी उतरेगी। यानी प्रकारांतर से वह यही कह रहे हैं कि दुनिया इस वायरस से बचने के  उपायों को ही इसका ठोस उपचार समझे।
विज्ञान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपनी सीमाओं को छिपाता नहीं है। प्रयोग-जन्य सत्य पर आधारित होने के नाते उसे यह स्वीकारने में भी कोई गुरेज नहीं कि दशकों के अध्ययन, रिसर्च के बाद भी वह कुछ वायरसों, बीमारियों का तोड़ नहीं ढूंढ़ सका है। एचआईवी का उदाहरण हमारे सामने है। पिछले चार दशकों से इस वायरस को पछाड़ने की कवायदें जारी हैं, मगर आज तक इसकी कोई वैक्सीन नहीं बन सकी। इस बीच तीन करोड़ से भी ज्यादा लोग दुनिया भर में इसकी भेंट चढ़ चुके हैं। एचआईवी के संक्रमण या डेंगू के मच्छरों से बचाव अपेक्षाकृत आसान है, पर क्या इन्होंने इंसानी जीवन शैली को प्रभावित नहीं किया? निस्संदेह, किया है। सच यही है कि जागरूक लोग अब इनकी जद में कम आते हैं। कोविड-19 से निपटने में भी जागरूकता ही फिलहाल सबसे बड़ी दवा है। न्यूजीलैंड, वियतनाम जैसे देशों ने दिखाया है कि  इस दवा से यह मुश्किल जंग जीती जा सकती है। न्यूजीलैंड में 1,486 संक्रमित लोगों में से 1,300 से अधिक ठीक होकर अपने घर लौट चुके हैं, जबकि नौ करोड़ से भी अधिक आबादी वाले वियतनाम में एक भी नागरिक की जान इससे नहीं गई। इस तथ्य के बावजूद कि चीन से उसकी सीमाएं लगती हैं। वहां 271 संक्रमित लोगों में 232 ठीक हो चुके हैं।                
कोरोना संक्रमण के रोज-रोज बढ़ते आंकड़ों से सहमी हुई दुनिया को यह कुबूल करना होगा कि उसे इस वायरस के साथ ही अभी जीना है। और इसके लिए उसे कचरा फैलाने वाली अपनी पुरानी जीवन शैली का मोह त्यागना होगा। सरकारें कितने कानून बनाएंगी? कोई भी प्रशासन एक छोटी अवधि तक ही सख्ती बरत सकता है, अंतत: इंसानी समाज को ही किसी कायदे-कानून की लाज रखनी होती है। जब प्रश्न जिंदगी और मौत का हो, तो तीसरा कोई विकल्प नहीं होता। फिजिकल डिस्टेंसिंग को बरतते हुए संक्रमित की शिनाख्त जब समाज के स्तर पर होगी, बगैर किसी नफरत और भेदभाव के, तभी इस महामारी पर जीत भी मिलेगी। कोविड-19 ने हमारे जीने के अंदाज पर हमेशा के लिए कुछ चीजें थोप दी हैं और हमारे पास उन्हें अपनाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है। भीड़ का हिस्सा बनने और बनाने से परहेज के साथ यह दौर हमें कई आडंबरों से भी दूर रहने की सीख दे रहा है।

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  • Web Title:hindustan editorial column 6 may 2020