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27 नवंबर, 2020|5:16|IST

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नए स्तर पर संक्रमण

कोरोना संक्रमण और इससे होने वाली मौत के आंकडे़ अब हमें उस तरह नहीं चौंकाते, जैसे शुरुआती महीनों में चौंकाया करते थे, तो इसका कारण समझा जा सकता है। इंसान अपने हालात के साथ तेजी से तालमेल बिठा लेता है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इस महामारी की गंभीरता कम हो गई है या इसे लेकर किसी तरह की लापरवाही को नजरंदाज कर दिया जाए। निस्संदेह, देश में संक्रमण की जांच अब बड़े पैमाने पर हो रही है, इसलिए पॉजिटिव मरीजों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कल ही बताया कि पिछले 24 घंटे में 11 लाख से अधिक लोगों की जांच की गई थी। बुधवार को संक्रमण के 80 हजार से अधिक नए मामले सामने आए और 1,023 लोगों को इस वायरस के कारण जान गंवानी पड़ी। इसलिए यह वक्त अतिरिक्त सावधानी का है, क्योंकि तमाम सुविधाओं में बढ़ोतरी के बावजूद वे हमारी आबादी की मांग के आगे हमेशा कमतर रहेंगी। 
देश और दुनिया के जो आर्थिक हालात हैं, वे सरकारों को अब अनलॉक की प्रक्रिया अपनाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। भारत में भी क्रमिक रूप से अनिवार्य नागरिक गतिविधियों की अनुमति दी जा रही है। सोमवार से कुछ शर्तों के साथ दिल्ली मेट्रो के परिचालन को हरी झंडी इसी कड़ी का हिस्सा है। कुछ राज्यों ने शनिवार और रविवार के लॉकडाउन को हटा लिया है। लेकिन नागरिकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अर्थव्यवस्था को जल्दी से जल्दी पटरी पर लाना अब बहुत जरूरी हो गया है और इसीलिए ये जोखिम उठाए जा रहे हैं। ऐसे में, लोगों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। उन्हें स्वास्थ्य विभाग की अपेक्षाओं के अनुरूप आचरण करना होगा। क्योंकि अभी कितने दिनों में यह बढ़ोतरी ढलान पर आएगी, इसका ठोस अंदाजा किसी के पास नहीं है। अमेरिका जैसे साधन संपन्न देश के विशेषज्ञ इस साल के अंत तक किसी कारगर वैक्सीन या दवा की उम्मीद तो जता रहे हैं, मगर उन्हें कामयाबी मिल भी गई, तब भी शेष दुनिया को उस दवा या वैक्सीन के लिए अगले साल तक इंतजार करना पडे़गा।
इस त्रासद दौर में सुखद सूचना यह है कि देश में संक्रमण के ऐक्टिव मामलों के मुकाबले साढ़े तीन गुना अधिक लोग अब तक ठीक हो चुके हैं। अकेले बुधवार को ही 68 हजार से अधिक की रिकॉर्ड संख्या में लोग इसकी जद से बाहर निकल आए। इस सकारात्मकता को स्थाई रूप देने के लिए हमें वे तमाम एहतियात बरतने पड़ेंगे, जिनका आह्वान लगातार किया जा रहा है। सरकार के मुताबिक, देश के पांच राज्यों- तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में ही 62 प्रतिशत ऐक्टिव मामले हैं। जाहिर है, वहां ज्यादा चौकसी की जरूरत है। मगर बिहार, बंगाल और असम जैसे राज्यों को भी अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि आने वाले महीने वहां राजनीतिक गहमागहमी के होंगे। बिहार विधानसभा चुनाव तो दो महीने के भीतर ही होंगे। ऐसे में, यह न सिर्फ राज्य-तंत्र, बल्कि राजनीतिक दलों व नेताओं के लिए भी इम्तिहान की घड़ी है। उम्मीदवारों को जीत भी हासिल करनी है और मतदाताओं के लिए संक्रमण मुक्त माहौल भी रचना है। इसमें किसी के लिए कोताही की कोई गुंजाइश नहीं है।

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  • Web Title:hindustan editorial column 4 september 2020