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जनादेश का संदेश

अठारहवीं लोकसभा चुनाव के परिणाम न केवल चौंकने, बल्कि सोचने पर भी मजबूर कर रहे हैं। कोई बहुत बड़ा उलट-फेर नहीं है, पर जो हुआ है, उसकी तरह-तरह से विवेचना संभव है। अगर शुद्ध गणितीय दृष्टि से देखें...

जनादेश का संदेश
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानTue, 04 Jun 2024 08:54 PM
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अठारहवीं लोकसभा चुनाव के परिणाम न केवल चौंकने, बल्कि सोचने पर भी मजबूर कर रहे हैं। कोई बहुत बड़ा उलट-फेर नहीं है, पर जो हुआ है, उसकी तरह-तरह से विवेचना संभव है। अगर शुद्ध गणितीय दृष्टि से देखें, तो कुल मिलाकर, केंद्र में सत्तारूढ़ प्रमुख पार्टी को जोर कम हुआ है। चार सौ पार पहुंचने का उसका मनसूबा पूरा नहीं हुआ। पिछले चुनाव में भाजपा को अकेले ही 303 सीटों के साथ भारी बहुमत मिला था, पर इस बार बहुमत दरकता दिखा है। वैसे, भारत जैसे राजनीतिक, सामाजिक विविधता वाले देश में यह कोई कम बड़ी बात नहीं कि एक पार्टी-एक नेता नरेंद्र मोदी लगातार दो बार सत्ता में रहने के बावजूद तीसरी दफा भी मिले-जुले जनादेश के बाद सरकार बनाने में सक्षम हो गए हैं। उन्हें न जाने क्या-क्या कहा गया, लेकिन व्यापकता में लोगों की नजरों में वह अभी भी देश के नंबर वन नेता हैं। हां, यह जरूर है कि साल 2014 और साल 2019 के चुनाव में भाजपा को अकेले ही बहुमत हासिल था और अन्य सहयोगियों के साथ वह बहुत आसानी से दस साल तक सरकार चला पाई। अब ताजा चुनावी नतीजे पहला इशारा तो यही कर रहे हैं कि तीसरी बार भाजपा को सरकार चलाने में उतनी सुविधा नहीं होगी। मतलब, देश में दस साल बाद फिर गठबंधन पर निर्भरता का दौर लौट आया है।
विपक्ष के नजरिये से अगर परिणामों को देखा जाए, तो यह एक बड़ी कामयाबी है कि प्रमुख विपक्षी गठबंधन के पास सवा दो सौ से ज्यादा सीटें हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में विपक्षी गठबंधन यूपीए के पास 92 सीटें थीं, पर अब इंडिया ब्लॉक के पास इतनी सीटें हैं कि वह मजबूती के साथ सत्ता पक्ष को चुनौती दे सकता है। पिछले चुनाव में समाजवादी पार्टी विपक्ष में तो थी, पर कांग्रेस के साथ नहीं थी, इस बार कांग्रेस के साथ उसका होना खासतौर पर उत्तर प्रदेश में रंग लाया है। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ ही कांग्रेस को भी बहुत लाभ हुआ है। समाजवादी पार्टी देश में तीसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी है, तो देश में दूसरे नंबर की पार्टी के रूप में कांग्रेस ने अपने प्रदर्शन को बहुत सुधारा है। पिछले दो चुनावों में वह 44 और 52 सीटों पर सिमट गई थी, जिससे मुख्य विपक्षी पार्टी और नेता प्रतिपक्ष का आधिकारिक दरजा भी उसे नहीं मिल सका। इस बार कांग्रेस के पास 20 प्रतिशत के करीब सीटें हैं और उसे मुख्य विपक्षी होने का आधिकारिक दर्जा मिल जाएगा। अत: लोकसभा में कांग्रेस के पास एक नई शुरुआत करने का मौका है। 
गौर करने की बात है कि इस चुनाव में गठबंधन की बहुत बड़ी भूमिका रही है। जहां, भाजपा इस बार गठबंधन के मोरचे पर कमजोर थी, वहीं कांग्रेस ने आगे बढ़कर गठबंधन किया। यहां यह याद कर लेना जरूरी है कि गठबंधन करके आगे बढ़ने के प्रति कांग्रेस जब गंभीर नहीं थी, तब उसे सियासी नुकसान हुआ था और देश में प्रमुख दल होने का उसका गौरव भी छिन गया था। इस बार चुनाव से पहले कांग्रेस ने गठबंधन के प्रति पर्याप्त गंभीरता दिखाकर एक नए प्रकार की राजनीतिक संस्कृति को जन्म दिया है, यह संस्कृति भले ही भाजपा को उखाड़ फेंकने के लिए खड़ी हुई, पर लगता है, आने वाले कुछ वर्षों में विपक्षी गठबंधनों के लिए यही तरीका मुफीद है। जहां तक सत्ता पक्ष की बात है, समर्थन में आई कमी सोचने का अवसर है और यह सोचना तब ज्यादा सार्थक होगा, जब जनता के अनुरूप और अच्छी नीतियों के साथ कामकाज में सुधार किया जाएगा।  

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