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27 नवंबर, 2020|4:13|IST

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सोशल प्लेटफॉर्म की चिंता

फेसबुक पर अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति पर अंकुश, दोनों ही विषयों पर भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में चिंता का आलम है, तो कोई आश्चर्य नहीं। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों को ही फेसबुक से शिकायत है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस पिछले कुछ दिनों से लगातार फेसबुक की शिकायत करती आ रही है, तो अब केंद्र सरकार ने भी आधिकारिक रूप से अपनी नाराजगी का इजहार कर दिया है। बुधवार को सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय समिति इस मामले पर ज्यादा सक्रिय थी, तो उधर पश्चिम बंगाल सरकार या तृणमूल कांग्रेस ने भी फेसबुक से अपनी नाखुशी का इजहार कर दिया है। कुल निचोड़ यह है कि सभी को फेसबुक से शिकायत है और सभी चाहते हैं कि इसे नियंत्रित किया जाए। ताजा खबर यह है कि अनेक देशों में फेसबुक ने अपने अधिकार बढ़ा लिए हैं और अब वह आपत्तिजनक या स्थानीय कानूनों या नियामकों के मद्देनजर कंटेंट को हटा या बाधित कर सकता है। एक अक्तूबर से फेसबुक यह काम करने लगेगा। उसने अपने उपभोक्ताओं को इस बारे में सूचित करना शुरू कर दिया है। यह जरूरी है कि ऐसे ही नियम भारत में भी लागू हों। स्थानीय कानूनों के अनुरूप ही किसी पोस्ट के प्रसारण को मंजूरी मिले।
दरअसल, फेसबुक अमेरिका से लेकर भारत तक एक ऐसा सशक्त मंच बच चुका है, जिस पर हरेक पक्ष, विचार, संगठन के लोग समान रूप से सक्रिय हैं। यह बात छिपी नहीं है कि अनेक कंपनियां और सियासी पार्टियां भारी धन खर्च करके फेसबुक के माध्यम से अपना-अपना नैरेटिव लोगों के गले उतारने में जुटी रहती हैं और इस प्रक्रिया को किसी भी सोशल मंच पर रोकने के लिए नियम-कायदे कड़े करने की जरूरत है। यह जरूरी है कि फेसबुक को अंकुश में रखा जाए और अंकुश किसी सत्ताधारी पार्टी या सरकार का नहीं, बल्कि नियम-कायदों का हो। भारत में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टी की सरकारें हैं और जो पार्टी जहां मजबूत है, वहां वह अपने हिसाब से फेसबुक को ही नहीं, बल्कि अन्य सोशल मंचों को भी संचालित करने की कोशिश करती है। एक गंभीर समस्या और है। ऐसे सोशल मंच वाली कंपनियों में काम करने वाले इंसान ही हैं और उनकी भी अपनी विचारधारा संभव है। आज फेसबुक कंपनी के विरुद्ध सबसे बड़ी शिकायत यही है कि वह विचारधारा के आधार पर कंटेंट का संपादन कर रही है। अच्छा यही होगा कि फेसबुक अपने संपादकों व कर्मचारियों को निष्पक्ष और संवदेनशील बनाए। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई सोशल मीडिया मंच पैसे लेकर किसी कंटेंट को रोके या प्रसारित करे। यह आम लोगों का मंच है और यहां जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावत चरितार्थ नहीं होनी चाहिए।
आज सरकार से भी बड़ी जिम्मेदारी संसदीय समिति की है, जिसमें सभी दलों के नेता हैं। उन्हें सर्वानुमति से एक आचार संहिता का निर्माण करना चाहिए। कानून के दायरे में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा बहुत जरूरी है और उससे भी जरूरी है सोशल मंचों के दुरुपयोग को रोकना। यदि हम इस मंच के दुरुपयोग को रोक पाते हैं, तो यह हमारी एक बड़ी सफलता होगी। जहां तक फेसबुक का सवाल है, तो उसके लिए सबसे बड़ी सफलता यही होगी कि वह सत्ता या धन के अनावश्यक दबाव में अपना दुरुपयोग न खुद करे और न किसी को करने दे।

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  • Web Title:hindustan editorial column 3 september 2020