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27 नवंबर, 2020|4:35|IST

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परीक्षा तय  

सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालयों के अंतिम वर्ष की परीक्षाओं को हरी झंडी दिखाते हुए न केवल साहसिकता का परिचय दिया है, बल्कि शिक्षा में परीक्षा के महत्व को भी स्थापित किया है। कोरोना के समय देश भर के कॉलेजों में जहां बाकी वर्षों के विद्यार्थियों को प्रमोट कर दिया गया, वहीं अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों की परीक्षा रुकी हुई है। अंतिम वर्ष की परीक्षाओं में कई महीनों की देरी पहले ही हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के अनुसार, कोई राज्य सितंबर महीने तक इन परीक्षाओं को टाल सकता है, लेकिन बिना परीक्षा किसी को उपाधि नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संकेत मिलता है कि विश्वविद्यालयों को हर हाल में इसी साल अंतिम वर्ष की परीक्षा लेनी पड़ेगी। कोई राज्य परीक्षाओं को स्थगित कर सकता है, लेकिन रद्द नहीं कर सकता। 
सुप्रीम कोर्ट के लिए यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन जब कोर्ट में जेईई और नीट को मंजूरी मिल गई, तो अंतिम वर्ष की परीक्षाओं को रोकने के तर्क कमजोर पड़ गए। यह फैसला प्रत्याशित था, लेकिन इससे राज्यों की चिंता बढ़ जाएगी। अनेक याचिकाओं में कोविड-19 की वजह से परीक्षा रद्द करने की मांग की गई थी। परीक्षा रद्द करने के समर्थकों का कहना है कि अंतिम वर्ष के जो विद्यार्थी दो, तीन या चार वर्ष की परीक्षाएं पहले दे चुके हैं, उन्हें उनके पूर्व प्रदर्शन के आधार पर अंतिम वर्ष के लिए भी अंक देते हुए उपाधि दी जा सकती है। इसके खिलाफ तर्क यह है कि अंतिम वर्ष की विशेषता और परीक्षा के महत्व को खत्म न किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम वर्ष की परीक्षा के महत्व को ही सिद्ध किया है और शैक्षणिक लिहाज से गुणवत्ता बनाए रखने के लिए यह जरूरी भी है। कोर्ट ने फैसला सुना दिया कि आंतरिक आकलन पर्याप्त नहीं होगा। न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एमआर शाह ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए फैसला सुनाते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के महत्व और काम को भी बढ़ा दिया है। अगर राज्यों को लगता है कि वे अभी परीक्षा आयोजित नहीं कर सकते, तो वे राहत के लिए यूजीसी से संपर्क कर सकते हैं। यूजीसी ने अंतिम वर्ष की परीक्षाओं को रद्द करने के दिल्ली और महाराष्ट्र सरकार के फैसलों पर सवाल उठाए थे। यूजीसी भले ही शिक्षा के मानकों को बचाने में जुटा है, लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि भारत में कोरोना के मामले 34 लाख के करीब पहुंच गए हैं और अब प्रतिदिन मरने वालों की संख्या 1,000 के पार चल रही है, तब राज्यों के लिए विश्वविद्यालयों में परीक्षा कराना जेईई और नीट के आयोजन से भी बड़ी चुनौती होगी। 
केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के विगत कुछ फैसलों से साफ हो गया है कि ये दोनों प्रतिष्ठान भविष्य की ओर दृढ़ता और साहस के साथ देख रहे हैं, लेकिन वास्तविक चुनौती का सामना राज्य सरकारों को करना है, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सितंबर में परीक्षा कराने से मना कर दिया है और अपने शिक्षा मंत्री को यह निर्देश दिया है कि वह संबंधित संस्थानों से बात कर आगे की राह निकालें। क्या ऑनलाइन या ऑफलाइन परीक्षाएं संभव हैं? कुल मिलाकर, अब हरेक राज्य सरकार को परीक्षाओं के आयोजन में ऐसे इंतजाम करने होंगे, ताकि परीक्षा कराने के फैसले पर किसी को पछताना न पडे़।

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  • Web Title:hindustan editorial column 29 august 2020