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संपादकीय

इंसानियत पर हमला

हिन्दुस्तानPublished By: Naman Dixit
Fri, 27 Aug 2021 11:38 PM
इंसानियत पर हमला

काबुल हवाई अड्डे पर हुए धमाकों की जितनी निंदा की जाए, कम होगी। किसी मजहब की बात छोड़ दीजिए, आज इंसानियत शर्मसार है।ैकैसानिर्मम शासन आया है, डर से लोग भाग रहे हैं और भागते लोगों पर आतंकियों ने हमला किया है। इन धमाकों में करीब सौ लोग मारे गए हैं, जिनमें 13 अमेरिकी सैनिक भी शामिल हैं। दो सौ के करीब लोग घायल हुए हैं, जो अब जीवन भर उस दहशत को याद करेंगे, जो उन्हें कथित मजहबी साये में नसीब हुई है। धिक्कार है, ऐसे लोगों पर, जिनमें रत्ती भर भी दया नहीं, जिनकी आंखों का पानी सूख गया है। जो लोग काबुल हवाई अड्डे पर जुटे थे, वे कोई दुश्मन या आतंकवादी नहीं थे। वे डरे हुए लोग हैं, जो जान बचाकर भागने में भलाई समझ रहे हैं, लेकिन उन्हें भागने से रोकने का यह कौन-सा तरीका हुआ? आज अफगानिस्तान की जमीन शर्मसार है, शायद कभी इस जमीन के लोगों को भलमनसाहत के लिए पहचाना जाता था। इनके सीधेपन की दुहाई दी जाती थी। भारत में जिस काबुलीवाले को हम जानते हैं, वह आज काबुल में कहां है? कौन काबुलीवाला रहम की भीख मांग रहा है और कौैन काबुलीवाला अपनों के ही खून का प्यासा बन गया है? 
खैर, काबुल में चल रहे राहत अभियान को झटका लगा है, लेकिन अभियान रुका नहीं है। शोषित काबुलीवालों की वापसी फिर शुरू हो गई है। हमले के एक दिन बाद अमेरिका ने फिर अपने नागरिकों और अधिकारियों को काबुल से निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। हालांकि, अमेरिका का कहना है कि विदेशी सैनिकों की वापसी की मंगलवार की समय- सीमा से पहले और हमले की आशंका है। अमेरिका अपनी जुबान का पक्का होने की कोशिश कर रहा है, लेकिन क्या तालिबान भी अपनी जुबान के पक्के हैं? अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भले ही कह दिया हो कि वह एक-एक मौत का बदला लेंगे, लेकिन यह भला कैसे होगा? क्या अमेरिका सीधी लड़ाई के बजाय छद्म लड़ाई के पक्ष में है? अगर ऐसी कोई लड़ाई छिड़ेगी, तो अफगानिस्तान ही तबाह होगा और इसका दुष्प्रभाव दुनिया झेलेगी। जो लोग सीधी लड़ाई में नहीं सुधरे, क्या वे चुन-चुनकर बदला लेने से सुधर जाएंगे? यह गौर करने की बात है कि तालिबान का दुस्साहस बढ़ा ही इसलिए है, क्योंकि अमेरिका लौट रहा है। यह हमला पश्चिमी देशों के लिए बड़ा सबक है, जो आतंकवाद के खिलाफ पूरी तरह ईमानदार नहीं रहे हैं। ईमानदारी होती, तो न तालिबान यूं काबुल पर चढ़ आते और न अमेरिकी सैनिक शहीद होते। अपने देश में लोकतंत्र सुनिश्चित रखना और दूसरे देशों में तानाशाही या ताकत के सामने घुटने टेक देना उदारता नहीं है। ऐसी ही कथित उदारता पाकिस्तान जैसे देशों में आतंकवाद के पालन-पोषण की वजह है। अब अफगानियों को अपनी मिट्टी के प्रति सजग होना चाहिए। जो समूह अभी भी तालिबान से लोहा ले रहे हैं, उनके साथ खड़े होने का वक्त है। अफगानियों को अपना हित देखना चाहिए। ऐसे नेता या राष्ट्रपति की जरूरत नहीं, जो डर के मारे खजाना समेटकर रातोंरात नौ दो ग्यारह हो जाए। यह अफगानी मिट्टी में पैदा बंदूकधारी कायरों को नहीं, बल्कि इंसानियत के प्रति सजग वीरों और उनके संगठनों को सही मायने में मजबूत करने का वक्त है। यह काम अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया के लोग घर बैठे कर सकते थे और कर सकते हैं।
 

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