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टकराव से शुरुआत

लोकसभा अध्यक्ष पद को लेकर सरकार व विपक्ष के बीच टकराव की स्थिति अठारहवीं लोकसभा की सुखद शुरुआत नहीं कही जा सकती। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की ओर से पूर्व लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला...

टकराव से शुरुआत
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Pankaj Tomarहिन्दुस्तानTue, 25 Jun 2024 08:49 PM
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लोकसभा अध्यक्ष पद को लेकर सरकार व विपक्ष के बीच टकराव की स्थिति अठारहवीं लोकसभा की सुखद शुरुआत नहीं कही जा सकती। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की ओर से पूर्व लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इनक्लूसिव अलायन्स (इंडिया) की तरफ से के सुरेश के नामांकन दाखिल करने के साथ ही सर्वसम्मति से लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने की एक स्वस्थ परंपरा के आगे सवाल खड़ा हो गया है। ‘इंडिया’ ब्लॉक को शायद यह उम्मीद थी, बल्कि शिव सेना जैसा उसका घटक दल तो खुलकर बोल भी रहा था कि यदि टीडीपी के किसी सांसद का नाम सत्तारूढ़ खेमे की ओर से इस पद के लिए प्रस्तावित किया जाता है, तो वे उसका समर्थन कर सकते हैं, पर जिस तरह पिछली सरकार के अहम चेहरों को नई सरकार में उनकी पुरानी भूमिका सौंपी गई, उसे देखते हुए यह लगने लगा था कि ओम बिरला का नाम ही फिर लोकसभाध्यक्ष पद के लिए आगे किया जाएगा। ऐसा ही हुआ। बिरला राजस्थान से तीसरी बार भाजपा के टिकट पर लोकसभा पहुंचे हैं, तो उनके सामने खडे़ के सुरेश आठवीं बार कांग्रेस सदस्य के रूप में केरल से चुनकर आए हैं।
इसमें कोई दोराय नहीं कि अठारहवीं लोकसभा के अंकगणित ने विपक्ष को भरपूर हौसला दिया है। पिछले दो सदनों में तो आधिकारिक रूप से कोई नेता प्रतिपक्ष ही नहीं था। यहां तक कि पिछली लोकसभा बिना उपाध्यक्ष पद के खत्म हो गई। लगभग हर सत्र में विपक्ष इस पद पर नियुक्ति की मांग करता रहा, पर उसकी मांगें अनसुनी कर दी गईं। मगर इस बार विपक्ष के तेवर से साफ लगता है कि वह सत्ता पक्ष के आगे चुनौती पेश करता रहेगा। मगर इस दांव-पेच में अच्छी लोकतांत्रिक परंपराओं की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत का संसदीय लोकतंत्र तभी सुर्खरू होगा, जब पिछले साढे़ सात दशकों में हमने जो स्वस्थ परंपराएं विकसित की हैं, उनको और मजबूती दी जाए, बल्कि हमारी संसद अपने कृत्यों से व्यापक भारतीय समाज को सामंजस्य व समावेशिता का पाठ पढ़ाए। 
निस्संदेह, लोकसभाध्यक्ष या विधानसभाध्यक्ष का पद काफी अहम होता है और इस मौकापरस्त दौर में कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी, खासकर जिसके पास अपने तईं सदन में बहुमत न हो, कभी नहीं चाहेगी कि किसी अन्य दल का सदस्य इस पद पर आरूढ़ हो जाए। हाल के वर्षों में विभिन्न विधानसभाध्यक्षों की भूमिका जिस कदर संदिग्ध दिखी और बार-बार उनके फैसले जिस तरह शीर्ष अदालत में पहुंचे, ऐसे में स्वाभाविक है कि भाजपा कोई भी जोखिम नहीं मोल लेना चाहती। मगर किसी भी सत्तारूढ़ दल की ऐसी मजबूरी अपने आप में हमारी वर्तमान राजनीति पर एक कटु टिप्पणी है, क्योंकि हमारे पास कई अच्छी मिसालें हैं। हम याद कर सकते हैं कि चौथी लोकसभा के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होते ही नीलम संजीव रेड्डी ने किस तरह कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था या मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल में लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने अपनी पार्टी के सियासी रुख के विपरीत अपना सांविधानिक दायित्व निभाया था। पहले भी जीएमसी बालयोगी, मनोहर जोशी जैसे लोकसभाध्यक्ष सबसे बड़ी पार्टी के नुमाइंदे नहीं थे। इस आम चुनाव ने भारतीय राजनीति के कई समीकरणों को बदला है। इसलिए चुनौती अब दोनों पक्षों के आगे है कि वे जनता की नजरों में अपने-अपने कदमों का औचित्य किस तरह साबित करेंगे।  

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