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पुलों का ढहना

बिहार में एक ही सप्ताह में तीन पुलों का ढहना जितना चिंताजनक, उतना ही निंदनीय भी है। तीनों पुल अलग-अलग प्रकार के हैं। एक पुल नया बना था, तो दूसरा पुराना हो चुका था और तीसरा तो अभी बन ही रहा था...

पुलों का ढहना
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानMon, 24 Jun 2024 10:50 PM
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बिहार में एक ही सप्ताह में तीन पुलों का ढहना जितना चिंताजनक, उतना ही निंदनीय भी है। तीनों पुल अलग-अलग प्रकार के हैं। एक पुल नया बना था, तो दूसरा पुराना हो चुका था और तीसरा तो अभी बन ही रहा था। अररिया में नवनिर्मित पुल करीब 180 मीटर लंबा था और जाहिर है, उसके निर्माण में गंभीर लापरवाही हुई है, इसलिए यह 18 जून मंगलवार को धूल में मिल गया। यह गहरे अफसोस और शर्म की भी बात है कि इस पुल का उद्घाटन तक नहीं हुआ था। इसे मलबे में बदलने में कुछ सेकंड लगे, पर वास्तव में पुल को मलबा बनाने की साजिश महीनों से चल रही होगी? पुल बनाने वाले ठेकेदार अगर इस काम की विशेषज्ञता नहीं रखते थे, तब उन्हें काम क्यों दिया गया? इस बात की पूरी जांच होनी चाहिए। हो सकता है, ठेकेदार या निर्माण कंपनी की सीधे-सीधे गलती न हो, पर अगर गलती है, तो अक्षम्य है। कमजोर पुल किसी भी वक्त जानलेवा साबित हो सकता है, जो भी ठेकेदार-इंजीनियर और शासकीय अधिकारी कमजोर पुल बनाते या बनवाते हैं, उन पर जान लेने की साजिश का मुकदमा चलना चाहिए।  
शनिवार, 22 जून को सीवान जिले में जो पुल ढहा है, वह अपेक्षाकृत छोटा था और ढहते वक्त उसके नीचे बहुत तेजी से पानी बह रहा था। अगर आसपास के लोग समय पर न देखते, तो बड़ी दुर्घटना हो सकती थी। कहा जा रहा है कि यह पुल 30 साल पुराना हो चुका था। पूछा जा सकता है कि क्या समय-समय पर इसकी मरम्मत होती थी? क्या मरम्मत से पुल के जीवन को बढ़ाया जा सकता था? अगर पुल की मरम्मत मुमकिन नहीं थी, तो समय रहते उसके बगल में एक अन्य पुल का निर्माण हो जाना चाहिए था। आदर्श स्थिति तो यही है कि जो पुल पुराने पड़ चुके हैं, उनके समानांतर नए पुल का निर्माण समय रहते होना चाहिए। यह प्रशासन के लिए ही नहीं, स्थानीय जन-प्रतिनिधियों के लिए भी शर्म की बात है कि पुल की स्थिति के प्रति उनकी सजगता उतनी नहीं है, जितनी होनी चाहिए। लोगों की सजगता से ही पुल बनते और मजबूत होते हैं। जहां के लोग सजग नहीं होते, वहां पुलों को ढहने से कोई रोक नहीं सकता। खैर, तीसरा पुल रविवार को मोतिहारी में गिरा है, जो अभी निर्माणाधीन था। यह बहुत दुख की बात है कि बारिश के मौसम में पुल टूट रहे हैं। बिहार में तमाम नदियां, नाले तेज बहेंगे, मजबूत पुलों की हर जगह जरूरत पड़ेगी। अब जब सप्ताह भर में तीन पुल ढह चुके हैं, तो जाहिर है कि लोगों की चिंता बहुत बढ़ गई होगी। 
आखिर कौन है जिम्मेदार? केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के कार्यालय ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा कि बिहार के अररिया में जो पुल ढह गया, उसका निर्माण केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के तहत नहीं किया गया था। इसका काम बिहार सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत चल रहा था। सबके पास अपने-अपने बहाने हैं? हर कोई जिम्मेदारी से बचना चाहता है? हालांकि, मूलभूत ढांचा विकास के मोर्चे पर बिहार में सजगता का विस्तार होना चाहिए। कई जगह यह शिकायत आती है कि लोग ही पुलों को कमजोर करते हैं, तो कई जगह ठेकेदारों से रंगदारी मांगने की शिकायतें भी सामने आती हैं। हमें यह समझना होगा कि सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और संरक्षण के कार्य में समाज की भी भागीदारी है। समाज अगर सजग रहे, तो गुणवत्ता वाले पुलों का निर्माण सुनिश्चित हो सकता है और ऐसा ही होना चाहिए।  

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