फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियन संपादकीयचार महादेशों का तपना

चार महादेशों का तपना

धरती के चार महादेश इतना तप रहे हैं कि लगता है, इस बार गर्मी तमाम कीर्तिमान तोड़ डालेगी। धूप या ताप से होने वाली मौतों को बहुत स्पष्टता से नहीं नापा जा सकता, फिर भी दुनिया में इस साल गर्मी की वजह से...

चार महादेशों का तपना
default image
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 23 Jun 2024 10:22 PM
ऐप पर पढ़ें

धरती के चार महादेश इतना तप रहे हैं कि लगता है, इस बार गर्मी तमाम कीर्तिमान तोड़ डालेगी। धूप या ताप से होने वाली मौतों को बहुत स्पष्टता से नहीं नापा जा सकता, फिर भी दुनिया में इस साल गर्मी की वजह से हजारों मौतें हुई हैं, इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े हैं। सऊदी अरब में इतनी ज्यादा गर्मी पड़ रही है कि वहां 900 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है, जिनमें 70 से ज्यादा तो अकेले भारतीय हैं। वहां 51 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच जा रहा पारा हाजियों के लिए काल बन जा रहा है। मिस्र में 530 से ज्यादा लोग मारे गए हैं, तो भारत में 1 मार्च से 18 जून के बीच 40,000 से अधिक हीटस्ट्रोक के मामले आए हैं और 100 से ज्यादा लोग काल के गाल में समा गए हैं। लू से मौत केवल एशिया और अफ्रीका तक सीमित नहीं है, यूरोपीय देशों में भी मौत हो रही है और अमेरिका में भी। यूएस नेशनल ओशनिक ऐंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के अर्थ ऑब्जर्वेटरी के मुताबिक, भूमध्य सागर के पास के देशों को भी प्रचंड उच्च तापमान का सामना करना पड़ रहा है, पुर्तगाल से ग्रीस और अल्जीरिया तक में जंगलों में आग लगी हुई है। 
वैज्ञानिक इस बात का एहसास करने लगे हैं कि दुनिया में बड़े पैमाने पर प्रयास करने पड़ेंगे, तभी अत्यधिक ताप से जीवन बचाया जा सकेगा। अपनी ठंड के लिए विख्यात न्यूयॉर्क का तपना तो और भी चिंताजनक है। जिन शहरों को कभी गर्मियों में खुशनुमा माना जाता था, वैसे शहर भारत से लेकर अमेरिका तक, अपनी पहचान खोते दिख रहे हैं। न्यूयॉर्क शहर में अनेक संस्थानों में शीतलन की व्यवस्था करनी पड़ी है, अनेक स्कूलों में बच्चों को दोपहर से पहले ही घर भेज दिया जा रहा है। अनेक अमेरिकी राज्यों में पारा 45 के पार पहुंच जा रहा है। न्यू मैक्सिको में भीषण गर्मी के चलते 23,000 एकड़ से अधिक भूमि जल गई और 500 से ज्यादा घर नष्ट हुए हैं। दुनिया के अनेक देशों में जंगल जल रहे हैं, जिनकी आग केवल भारी बारिश से ही बुझ सकती है। बढ़ता तापमान संकेत है कि दुनिया धीरे-धीरे असहनीय हो रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? गर्मी आज बड़ा सवाल है, पर उसका हमारे पास क्या जवाब है? 
हमें गंभीरता से सोचना होगा? ऐसी गर्मी के लिए नेपाल जैसा देश जिम्मेदार है या अमेरिका जैसा सुपरपावर? जलवायु परिवर्तन का मुद्दा जब छिड़ता है, तो अमेरिकी रवैया देख चिंता होती है। अमेरिका की दलील है, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग की कीमत नेपाल जैसा देश भी चुकाए, जबकि भारत जैसे देश चाहते हैं कि जलवायु परिवर्तन की लागत अमीर हो चुके देशों को ज्यादा चुकानी चाहिए। एक दौर वह भी था, जब अमेरिका ने जलवायु बचाव से अपने कदम पीछे खींचने शुरू कर दिए थे। अनेक अमीर देश हैं, जो खुशफहमी में हैं कि गर्मी उनका कुछ न बिगाड़ पाएगी, पैसे और ऊर्जा भंडार से वे अपना बचाव कर लेंगे। ऐसे देशों को झुलसाती धूप में खुली आंखों से सच्चाई को परखना और समझना चाहिए। भारत निरंतर गुहार लगाता रहता है, पर हरित तकनीक के हस्तांतरण में अभी भी खूब बाधाएं हैं। हरित तकनीक को महंगा किया जा रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों को दुनिया के विकासशील देशों में बहुत किफायती हो जाना चाहिए, पर विकसित देश यहां भी अपना व्यावसायिक लाभ देख रहे हैं। वाकई, निहित स्वार्थ से ऊपर उठकर ही दुनिया को बचाने के प्रयास सफल हो सकते हैं। 

अगला लेख पढ़ें