Hindustan Editorial Column 23rd January 2020 - सुप्रीम कोर्ट के हवाले DA Image
20 फरवरी, 2020|4:41|IST

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सुप्रीम कोर्ट के हवाले

नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष और विरोध में पूरा देश जिस तरह आंदोलित है, उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के सामने अच्छा विकल्प यही था कि वह इस मामले में कोई जल्दबाजी न दिखाए। इसलिए उस तर्क को सबसे पहले खारिज हो ही जाना था, जिसमें यह आग्रह किया जा रहा था कि इस कानून पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाई जाए। इस मामले के महत्व को देखते हुए अब इस मामले को पांच जजों की पीठ के हवाले कर दिया गया है। इसके साथ ही केंद्र सरकार को इस कानून पर उठाई गई आपत्तियों का जवाब देने के लिए चार सप्ताह का और समय दिया गया है। पांच सप्ताह के बाद अदालत मामले की अगली सुनवाई के लिए नई तारीख देगी। पिछली बार जब सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए 22 जनवरी की तारीख मुकर्रर की थी, तो 60 से अधिक याचिकाएं दायर की गई थीं। और यह तारीख आते-आते अदालत में लगभग 80 अन्य याचिकाएं दायर हो गईं, जिनमें केरल राज्य द्वारा दायर याचिका भी शामिल है। केंद्र सरकार का आग्रह था कि नए तर्कों को देखते हुए उसे जवाब तैयार करने के लिए थोड़ा वक्त और मिलना चाहिए। अदालत को इस तर्क में दम दिखाई दिया और उसका यह अनुरोध स्वीकार कर लिया गया।

इस समय अदालत में इस कानून की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली 143 याचिकाएं हैं। ज्यादातर में तर्क यही है कि इस कानून पर रोक लगनी चाहिए, क्योंकि यह संविधान की भावना के विपरीत है। हालांकि कुछ याचिकाएं ऐसी भी हैं, जो कहती हैं कि यह कानून असम समझौते का उल्लंघन करता है, इसलिए इस पर रोक लगनी चाहिए। ऐसी ही याचिका त्रिपुरा मामले में भी दायर की गई है। केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल का तर्क था कि कानून की सांविधानिक वैधता का मामला अलग है और असम-त्रिपुरा का मामला अलग, इसलिए इन दोनों तरह के मामलों में अलग-अलग सुनवाई होनी चाहिए। अदालत ने यह तर्क स्वीकार कर लिया, इसलिए अब दोनों तरह के मामलों की सुनवाई दो अलग-अलग पीठ करेंगी। यह ठीक है कि सांविधानिक वैधता का मामला अभी पूरे देश में चर्चा का मुख्य विषय है, इसलिए ज्यादा ध्यान उसी पर रहेगा, लेकिन असम समझौते को लेकर उठाए गए तर्क भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं और उस पर होने वाली बहस भी पूरे देश का ध्यान खींचेगी।

भले ही सुप्रीम कोर्ट का यह मकसद नहीं रहा होगा, लेकिन चार सप्ताह का जो समय दिया गया है, उसका एक राजनीतिक महत्व भी है। इस समय दिल्ली में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। जब तक मामले की अगली सुनवाई शुरू होगी, तब तक न सिर्फ दिल्ली के चुनाव हो चुके होंगे, बल्कि नई सरकार भी बन चुकी होगी। जाहिर है, इस मामले का राजनीतिक लाभ उठाने का मौका किसी को नहीं मिल सकेगा। अगर अदालत कानून पर तुरंत रोक लगा देती या हर रोज सुनवाई शुरू हो जाती, तो राजनीतिक तस्वीर कुछ अलग भी हो सकती थी। और जहां तक राजनीति का मामला है, तो अब जब सुप्रीम कोर्ट पूरे मामले पर विचार कर रहा है, तो इस कानून के खिलाफ देश भर में जगह-जगह धरना दे रहे लोगों को भी अपने आंदोलन के स्वरूप पर विचार करना चाहिए। सभी के लिए बेहतर यही होगा कि फिलहाल इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के हवाले ही छोड़ दिया जाए।

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column 23rd January 2020