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27 नवंबर, 2020|5:06|IST

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नए दौर में संक्रमण

कोरोना महामारी से जल्द निजात पाने की उम्मीद बंधाती कोई खबर अभी हम ठीक से जज्ब भी नहीं कर पा रहे कि एक विरोधी सूचना हमें फिर से चिंता के नए घेरे में घसीट ले जाती है। मंगलवार की सुबह जब हम इस समाचार को पढ़कर राहत महसूस कर रहे थे कि दिल्ली में वायरस संक्रमण अपने शिखर पर पहुंचकर अब ढलान की ओर है, तो इसके चंद घंटे बाद ही सीरोलॉजिकल सर्वे के नतीजों ने हमें सूचित किया कि राजधानी की लगभग एक चौथाई आबादी कोरोना वायरस के संपर्क में आ चुकी है। सर्वे में शामिल 23.48 प्रतिशत लोगों में ‘इम्युनोग्लोबुलिन जी’ एंटीबॉडी विकसित मिली। एक तथ्य यह भी है कि इनमें से काफी सारे लोगों में संक्रमण का कोई लक्षण नहीं दिखा। ऐसे में, दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री ने संक्रमण के दूसरे-तीसरे दौर की जो आशंका जताई है, उसे गंभीरता से लेने और तमाम एहतियाती कदमों को जारी रखने की जरूरत है।

भारत की विशाल आबादी को देखते हुए संक्रमण के लौटने की आशंका निकट भविष्य में बनी रहेगी। हमें नहीं भूलना चाहिए कि देश के कई इलाकों में वायरस का प्रसार तेज हुआ है। राष्ट्रीय स्तर पर रोजाना संक्रमितों की संख्या अब 40 हजार के आंकडे़ को पार कर चुकी है, बल्कि नए संक्रमण के मामले में हम अमेरिका और ब्राजील से भी आगे निकल गए हैं। इसीलिए कई राज्य सरकारों को फिर से पूर्ण लॉकडाउन की तरफ लौटना पड़ा है। हमारी चुनौती अगले कुछ दिनों-महीनों तक ऐसे हालात के साथ तालमेल बिठाने की है। इसमें सबसे बड़ी दिक्कत जनसंख्या के घनत्व के कारण पेश आ रही है। जाहिर है, इस वजह से तमाम प्रशासनिक तैयारियों की सीमाएं रह-रहकर उजागर हो जा रही हैं। यहीं पर नागरिक सहयोग और शिष्टाचार की हमें सबसे अधिक आवश्यकता है। दुनिया के कई देशों का उदाहरण हमारे सामने है। इस महामारी को वे अपने यहां तभी काबू में कर पाए हैं, जब उन्हें अपने नागरिकों का भरपूर सहयोग मिला। हम अपने यहां इस गंभीर स्थिति में भी अपेक्षित सहयोग की कमी महसूस कर रहे हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि इस महामारी की गंभीरता से देश का कोई कोना अब अनभिज्ञ है, पर पहले लॉकडाउन के दौरान नागरिक स्तर पर जो संजीदगी दिखी थी, वह अब नदारद है।

देश की भौगोलिक स्थितियों को देखते हुए अब कहीं ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है। पूर्वोत्तर भारत में बाढ़ की स्थिति गंभीर रूप लेने लगी है। ऐसे में, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन और ज्यादा मुश्किल होता जाएगा। फिर यह मौसम कई अन्य रोगों को भी अपने साथ लाता है। डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां हर साल एक गंभीर चुनौती पेश करती रही हैं। इसलिए वक्त आ गया है कि डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों का बोझ कम करने की कोशिश की जाए। यह भी एक प्रकार की देशभक्ति है। इस दौर में अपनी और अपने परिजनों की सेहत की समुचित देखभाल न सिर्फ देश की ऊर्जा और उसके संसाधनों की बचत में योगदान है, बल्कि अपनी आर्थिक मजबूती के लिहाज से भी मुफीद कोशिश है। शासन-प्रशासन की सिर्फ कमियां गिनाना नागरिक धर्म नहीं है, आपात स्थितियों में उनकी कमजोरियों को अपने सहयोग से दूर कर देना कहीं बड़ा नागरिक धर्म है। और इस फर्ज अदायगी का इससे माकूल वक्त कोई और नहीं हो सकता।

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column 22nd July 2020