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Hindi News ओपिनियन संपादकीयपराली पर सख्ती

पराली पर सख्ती

राजधानी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण की समस्या को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता न सिर्फ सराहनीय है, बल्कि कुछ राज्य सरकारों की उदासीनता को देखते हुए यह अनिवार्य भी बन गई है...

पराली पर सख्ती
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानTue, 21 Nov 2023 10:34 PM
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राजधानी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण की समस्या को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता न सिर्फ सराहनीय है, बल्कि कुछ राज्य सरकारों की उदासीनता को देखते हुए यह अनिवार्य भी बन गई है। खासकर पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं और उसके दुष्प्रभावों पर लंबे विमर्श व हिदायतों का खास असर न होता देख सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पंजाब सरकार से कुछ सख्त सवाल किए। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि जो लोग पराली जलाने से बाज नहीं आ रहे, उन पर अतिरिक्त जुर्माना क्यों नहीं लगाया जा रहा और अन्य आर्थिक लाभों से वंचित करने का विकल्प उनके विरुद्ध क्यों नहीं आजमाया जा रहा? अदालत ने छोटे व गरीब किसानों से सहानुभूति जताते हुए राज्य सरकार से साफ-साफ कहा कि उन्हें वित्तीय मदद पहुंचाना राज्य का काम है। जाहिर है, पंजाब सरकार अब तक इस मामले में किसानों को भरोसे में नहीं ले पाई है, जिसका खामियाजा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों को भुगतना पड़ता है।
दरअसल, हमारे देश में राजनीतिक प्रदूषण इतना गहरा हो गया है कि इसमें जल और वायु प्रदूषण जैसी जानलेवा स्थितियां भी एक-दूसरे पर तोहमत मढ़ने का विषय बनने लगी हैं। जिस मानवीय समस्या का सर्वमान्य निदान संबंधित सरकारों को आपस में मिल-बैठकर निकालना चाहिए, उसे वे दलीय चश्मे से देखे जा रही हैं और आम शहरी का सांस लेना दूभर हो चला है। पहले दिल्ली सरकार पंजाब और हरियाणा पर आरोप लगाती थी कि वहां पराली जलाने से राजधानी में वायु गुणवत्ता बिगड़ी है, मगर जब से पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है, उसका नजरिया बदल गया है। अदालत ने इस पहलू पर भी टिप्पणी की है। इसमें कोई दोराय नहीं कि पंजाब और हरियाणा ने हरित क्रांति में अहम भूमिका निभाई; देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में यहां के किसानों का बड़ा योगदान है। मगर इसका आर्थिक लाभ उन्हें भी मिला है। इसलिए, चंद किसानों को लोगों की सेहत से खिलवाड़ की छूट नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का निहितार्थ यही है।
पंजाब के किसानों के हित में यही है कि वे अपनी फसल प्राथमिकताओं पर नए सिरे से गौर करें। राज्य में धान उत्पादन पर अधिक जोर देने का साफ-साफ असर भूजल-स्तर पर दिखने लगा है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट की यह चिंता भी वाजिब है कि यदि वहां की जमीन में नमी की मात्रा कमजोर पड़ती गई, तो इसका नतीजा भयानक हो सकता है। न्यायमूर्ति एस के कौल ने तो पंजाब सरकार के साथ-साथ अन्य राज्य सरकारों को भी यह सलाह दी है कि वे अपने-अपने सूबे के किसानों को पर्यावरण एवं जल की स्थानीय उपलब्धता के अनुरूप फसलें चुनने को प्रेरित करें। केंद्र-राज्य सरकारों और राजनीतिक दलों को अब एक ऐसी संस्कृति विकसित करनी ही होगी, जिसमें नागरिकों के स्वास्थ्य की कीमत पर राजनीति की कोई गुंजाइश न हो। मुनासिब यही होगा कि सुप्रीम कोर्ट की चिंताओं और हिदायतों के आलोक में पंजाब सरकार पराली जलाने वालों के खिलाफ त्वरित कदम उठाए। जिन छोटे किसानों को वित्तीय मदद की दरकार है, उनके लिए स्थानीय तंत्र को अधिक संवेदनशील बनाए। केंद्र से आर्थिक सहूलियतें हासिल करने के लिए भी सरकारों में एक-दूसरे पर कुछ भरोसा होना चाहिए। केंद्र व पंजाब समेत दिल्ली से लगे अन्य राज्यों की सरकारें भी एनसीआर के लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं! 

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