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विदा नरीमन

आधुनिक भारत में जब-जब न्याय का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें विद्वान विधिवेत्ता फली एस नरीमन का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया जाएगा।  महान न्यायविद फली सैम नरीमन की विदाई भारत के लिए अपूरणीय क्षति है...

विदा नरीमन
Monika Minalहिन्दुस्तानWed, 21 Feb 2024 10:09 PM
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महान न्यायविद फली सैम नरीमन की विदाई भारत के लिए अपूरणीय क्षति है। वह एक ऐसे न्यायनिष्ठ भारतीय थे, जिनकी रगों में भारतीय संविधान बहता था और जिन्होंने अनगिनत मौकों पर इस देश में न्यायिक जटिलताओं को अपने बुद्धिबल से सुलझा दिया। आधुनिक भारत में जब-जब न्याय का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें फली एस नरीमन का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया जाएगा। अब यह इतिहास है कि युवा वय में नरीमन ने अंतिम विकल्प के रूप में विधि क्षेत्र को चुना था। 10 जनवरी, 1929 को रंगून में पैदा हुए नरीमन ने नवंबर 1950 में बॉम्बे हाईकोर्ट के वकील के रूप में अपना न्याय जीवन शुरू किया था। लगभग 22 साल उच्च न्यायालय में रहने के बाद वह सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नियुक्त किए गए थे। साल 1971 से ही वह सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों में हिस्सेदार बनने लगे थे।

लोकतंत्र के प्रति समर्पित नरीमन ने 25 जून,1975 को आपातकाल लगते ही दूसरे दिन एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के पद से इस्तीफा दे दिया था। वह समझ गए थे कि अब संविधान की पालना ऐसे होगी, जिसमें आम लोगों को परेशानियों का सामना करना पडे़गा। नरीमन के उस दोटूक फैसले को हमेशा याद किया जाएगा।
उनकी वह स्पष्टवादिता भारतीय न्यायतंत्र में चार चांद लगाती थी। सर्वोच्च न्यायालय में उनका होना हमें यह एहसास दिलाता था कि न्यायपालिका में अच्छे लोग पूरे दमखम के साथ डटे हैं। एक वकील को अपने जीवन में अनेक प्रकार के मुकदमे लड़ने पड़ते हैं और बहुत कम वकील ऐसे होते हैं, जो अपनी कभी गलती मानते हैं। मिसाल के लिए, भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार विदेशी कंपनी यूनियन कार्बाइड की पैरोकारी फली नरीमन ने की थी और अदालत के बाहर ही पीड़ितों के लिए भारी मुआवजा लेने की स्थितियां उन्होंने तैयार की थीं। वह समझ गए थे कि अंतिम फैसला आने में बहुत वक्त लगेगा, अत: जल्दी मुआवजा दिलाकर पीड़ितों को समय रहते राहत पहुंचाने का वह प्रयास आज भी याद है। उनकी अच्छाई का किस्सा यहीं खत्म नहीं हो जाता है, बाद के दिनों में उन्होंने यह माना कि उन्हें यूनियन कार्बाइड की पैरोकारी नहीं करनी चाहिए थी। अनेक दिग्गज वकील हुए हैं, जो बड़े अपराधियों की पैरोकारी बिना किसी संकोच के करते हैं और कभी उनके मुंह से उफ् तक नहीं निकलता। गलती स्वीकारने और न्याय समाज के सामने मिसाल पेश करने की यह ‘नरीमन अदा’ न्याय की पुस्तकों में सदा दर्ज रहेगी।
वह आजाद भारत के संविधान को लागू करने वाली पहली पीढ़ी के अधिवक्ता थे और न्यायपालिका का विशाल क्षेत्र व उसकी कमियां भी उन्हें विचलित करती थीं। सुधार की राह दिखाने के मकसद से उन्होंने एकाधिक किताबों की रचना की थी, इंडियाज लीगल सिस्टम : कैन इट बी सेव्ड? और गॉड सेव द ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट। इन पुस्तकों के नाम से ही उनकी बेमिसाल साफगोई का परिचय मिल जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित ही अपनी संवेदना व्यक्त की है कि ‘फली नरीमन सबसे उत्कृष्ट कानूनी दिमाग और बुद्धिजीवियों में से थे।’ वह पद्म विभूषण से सम्मानित हुए, राज्यसभा में मनोनीत हुए और 70 साल लगातार न्यायपालिका को सेवाएं देने के बाद संसार से गए हैं। न्याय की दुनिया में उन्हें जीवित किंवदंती भी कहा जाता था। अदालत में उनकी मौजूदगी मात्र से मुकदमे जागकर न्याय की ओर बढ़ चलते थे। वह न्याय संसार में प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। 

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