फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियन संपादकीयसुरंग में फंसे मजदूर

सुरंग में फंसे मजदूर

उत्तरकाशी के सिलक्यारा गांव की सुरंग में फंसी 41 जिंदगियों के लिए बेचैनी बढ़ती जा रही है, तो यह स्वाभाविक ही है। पिछले नौ दिनों से ये मजदूर इस सुरंग में फंसे हुए हैं और इनको सुरक्षित बाहर निकालने...

सुरंग में फंसे मजदूर
Amitesh Pandeyहिन्दुस्तानMon, 20 Nov 2023 10:37 PM
ऐप पर पढ़ें

उत्तरकाशी के सिलक्यारा गांव की सुरंग में फंसी 41 जिंदगियों के लिए बेचैनी बढ़ती जा रही है, तो यह स्वाभाविक ही है। पिछले नौ दिनों से ये मजदूर इस सुरंग में फंसे हुए हैं और इनको सुरक्षित बाहर निकालने के लिए किए जा रहे युद्ध-स्तरीय प्रयासों का अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया है। इससे भी हालात की गंभीरता स्पष्ट हो जाती है। हालांकि, एक अच्छी बात यह है कि उन सबसे संवाद हो पा रहा है और उन तक तक ऑक्सीजन, दवाएं व खाने की चीजें पहुंचाई जा रही हैं। मगर इस समय सबसे अधिक जरूरत उनके मनोबल को ऊंचा बनाए रखने की है और यह काम वहां पहुंचे उनके परिजन ज्यादा बेहतर कर सकते हैं। निस्संदेह, वे लोग भी कम अधीर नहीं हो रहे होंगे, लेकिन शासन-प्रशासन को उन्हें भरोसे में लेकर यह काम करना होगा। इन परिजनों को मौके पर सभी सुविधाएं मुहैया कराने के साथ-साथ मनोचिकित्सकों की सहायता भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सूबे के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से इस संदर्भ में जानकारी लेने से यकीनन परिजनों को संबल मिला होगा कि सरकार अपने तईं पूरी कोशिश कर रही है।    
यह हादसा कुछ सवाल भी खडे़ करता है। इस तरह की सुरंगों की खुदाई में क्या ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की जाती? अगर होती है, तो इसमें बचाव के विकल्प भी सोचे ही गए होंगे? उत्तरकाशी की इस सुरंग योजना में क्या वे एहतियाती कदम उठाए गए थे? खासकर तब, जब पहले से तमाम पर्यावरणविद् व स्थानीय बुद्धिजीवी पहाड़ी इलाकों की कतिपय परियोजनाओं को लेकर आगाह करते रहे हैं। इस घटना से केंद्र और राज्य सरकारों को गंभीर सबक लेने की जरूरत है, क्योंकि किसी भी अनहोनी का अन्य परियोजनाओं में कार्यरत मजदूरों के मनोबल पर प्रतिकूल असर पडे़गा। इसमें कोई दोराय नहीं कि पहाड़ों को भी विकास चाहिए। न सिर्फ वहां से हो रहे लगातार पलायन को रोकने के लिहाज से, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी यह खासा जरूरी है। मगर इसकी रूपरेखा उसके भूगोल के मिजाज के अनुरूप ही खींची जानी चाहिए। इसलिए उत्तरकाशी के इलाके में बढ़ती कुदरती आपदाओं का गहन अध्ययन बहुत आवश्यक है।
सुरंग मार्गों का निर्माण तो हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है, मगर प्रौद्योगिकीय तरक्की ने दुनिया भर की सरकारों और नीति-नियंताओं को इसके लिए प्रेरित किया है और अब तो काफी लंबे-लंबे ऐसे रास्ते बनाए बनने लगे हैं। जाहिर है, इससे न सिर्फ आवागमन आसान हुआ है, बल्कि सुदूर इलाकों तक विकास की रोशनी पहुंचाने में भी मदद मिली है। हमारे महानगरों को ही देख लीजिए, भूमिगत ट्रेनें हजारों मुसाफिरों के दैनिक जीवन को सुविधा-संपन्न बना रही हैं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश में छोटे-बडे़ कई सुरंगी मार्गों का उद्घाटन हुआ है। इससे वहां के लोगों के जीवन में काफी सहूलियतें भी आई हैं। ऐसे में, तमाम विकास परियोजनाओं को उत्तरकाशी जैसी घटना से निरापद बनाने की आवश्यकता है। यह घटना एक नागरिक, और एक मनुष्य के तौर पर भी हमसे संवेदनशील बनने की मांग करती है। हम सबको सुविधाएं तो चाहिए, मगर वे किस कीमत पर मिली हैं या मिलेंगी, इसके प्रति हम प्राय: उदासीन रहते हैं। तो अब जब भी किसी मुश्किल सुरंग या दुर्गम पहाड़ी राहों से गुजरें, अपनी कृतज्ञता उन मजदूरों और इंजीनियरों के प्रति जरूर प्रकट करें, जिन्होंने अपनी जान को जोखिम में डालकर उनको मुमकिन बनाया। 

अगला लेख पढ़ें