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समाधान की कोशिशें

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में चल रहे किसान आंदोलन के समाधान की कोशिशें एक-एक कर नाकाम हो रही हैं, तो यह न केवल दुखद, बल्कि चिंताजनक भी है। केंद्र सरकार ने 18 फरवरी को किसानों के सामने प्रस्ताव रखा...

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Pankaj Tomarहिन्दुस्तानMon, 19 Feb 2024 10:21 PM
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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में चल रहे किसान आंदोलन के समाधान की कोशिशें एक-एक कर नाकाम हो रही हैं, तो यह न केवल दुखद, बल्कि चिंताजनक भी है। केंद्र सरकार ने 18 फरवरी को किसानों के सामने प्रस्ताव रखा था, जिसके तहत किसानों के साथ पांच फसलों, अर्थात मक्का, कपास, अरहर, मसूर और उड़द की खरीद के लिए पांच साल का अनुबंध किया जाना था। सरकार के इस प्रस्ताव में किसान नेताओं ने विचार का आश्वासन दिया था, पर संयुक्त किसान मोर्चा ने 19 फरवरी को चंडीगढ़ में केंद्रीय मंत्रियों के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। सरकार चाहती है कि किसानों को फसल विविधीकरण के लिए प्रेरित किया जाए, पर किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य की वैधानिक गारंटी की मांग पर अड़े हुए हैं। वास्तव में, किसानों को दिया गया प्रस्ताव नया नहीं था और ऐसी आश्वस्ति एकाधिक पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र में पहले भी आ चुकी है। ऐसी ही अनुशंसा स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग ने साल 2006 में की थी। किसानों को पुरानी अनुशंसा पूरी होने का स्वागत करना चाहिए था, भले ही वे अपनी अन्य मांगों के लिए अडे़ रहते। कुल मिलाकर रविवार को जो उम्मीदें बंधी थीं, सोमवार शाम होते टूट गईं।
चंडीगढ़ में किसान नेताओं ने घोषणा कर दी है कि गारंटीशुदा खरीद वाली सभी फसलों के लिए एमएसपी@सी2+50 प्रतिशत से नीचे कुछ भी स्वीकार्य नहीं है। किसानों की मांग बहुत लंबी-चौड़ी है, जिसे वे बार-बार दोहरा रहे हैं। अन्य मांगों में ऋण माफी की मांग शामिल है। बिजली का निजीकरण नहीं करने, व्यापक सार्वजनिक क्षेत्र की फसल बीमा योजना लाने, 60 साल से अधिक उम्र के किसानों को 10,000 रुपये मासिक पेंशन देने, अजय मिश्रा टेनी को बर्खास्त करने और मुकदमा चलाने की भी मांग हो रही है। कुछ मांगें बहुत गंभीर किस्म की हैं, जिनको पूरा करने का असर देश में अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। देश में अनेक वर्ग ऐसे हैं, जो ताकतवर नहीं हैं, राजधानी को घेरने की स्थिति में नहीं हैं, तो क्या उनकी मांगें कभी नहीं मानी जाएंगी? खासतौर पर एक सूबे के किसान नेता अपने आंदोलन को देश भर में फैलाना चाहते हैं, तभी तो पूरे भारत में भाजपा व एनडीए के संसदीय क्षेत्रों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सार्वजनिक बैठकें और मशाल जुलूस आयोजित करने का आह्वान भी किया गया है। साफ है, किसान आंदोलन को पूरे देश में फैलाने के उपाय किए जा रहे हैं। हालांकि, अन्य राज्यों पर अगर हम नजर फेरें, तो किसान आंदोलन के प्रति सुगबुगाहट न के बराबर महसूस हो रही है। क्या इस आंदोलन के नेताओं ने बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे राज्यों के किसानों को भी विश्वास में लिया है? देखना चाहिए कि उनका आंदोलन एक सूबे का आंदोलन न मान लिया जाए।
चिंता बढ़ रही है कि किसानों का आंदोलन आने वाले दिनों में उग्र होता जाएगा। हालांकि, इस बार आंदोलन को पिछली बार की तरह व्यापक समर्थन नहीं दिख रहा है, क्योंकि ज्यादातर लोगों को लगता है कि चुनाव से ठीक पहले आंदोलन के राजनीतिक निहितार्थ ज्यादा हो सकते हैं। अगर सरकार द्वारा किसी आंदोलन के खिलाफ बल प्रयोग सही नहीं है, तो किसी आंदोलन की उग्रता या अनुशासनहीनता का भी कतई स्वागत नहीं किया जा सकता। शांतिपूर्ण और तार्किक समाधान की राह जल्द से जल्द निकलनी चाहिए। 

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