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27 अक्तूबर, 2020|1:48|IST

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सभ्यता की चिंता

महिलाओं की सुरक्षा का विषय एक बार फिर हमें झकझोर कर न सिर्फ सोचने पर मजबूर, बल्कि शर्मसार भी कर रहा है। जिस अपराध से हमारी मानव सभ्यता को सबसे पहले दामन छुड़ा लेना चाहिए था, उसी अपराध को हमारे बीच कई लोग ऐसे अंजाम देते हैं कि इंसानियत पर भी शक होने लगता है। हाथरस में 19 वर्षीय दलित लड़की के साथ हुई हैवानियत में न केवल समाज की जीभ काटने की चेष्टा हुई है, बल्कि रीढ़ को भी तोड़कर साफ संकेत दे दिया गया है। समाज को सबक लेना चाहिए, अब न केवल नई जीभ, बल्कि नई रीढ़ के साथ समाज को सामने आकर मुकाबला करना होगा। यह घिनौनी हैवानियत दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। हाथरस के बाद बलरामपुर, आजमगढ़, बुलंदशहर, बारां इत्यादि में भी मानवता शर्मसार हुई है। इस देश के सजग और विधि-प्रिय नागरिक जितने विचलित हैं, क्या हमारी व्यवस्थाएं भी उतनी ही चिंतित हैं? शायद ही कोई ऐसा राज्य होगा, जहां ऐसी घटनाओं पर पुलिस लीपापोती करने की कोशिश न करती हो। उत्तर प्रदेश में अगर इनकार की मुद्रा है, तो राजस्थान में भी वही ढर्रा है। व्यवस्था की टालमटोल, लापरवाही, उदासीनता का ही नतीजा है कि निर्भया के समय के बाद भी भारतीय समाज में बलात्कार की घटनाएं बढ़ती चली जा रही हैं। निर्भया के समय देश में भावनाओं में उबाल आया था और ऐसा लगा कि हम सुधार की दिशा में बढ़ेंगे। अब आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस वर्ष में महिलाओं के शोषण की आशंका में 44 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। पिछले वर्ष 32,033 बलात्कार हुए थे, जिसमें से करीब 11 प्रतिशत मामले दलित महिलाओं से जुड़े थे। 
महिलाओं के सम्मान या पूजा के बारे में किसी भी धर्म की कथनी पर जाने की बजाय हमें केवल करनी की चिंता करनी चाहिए। बड़ी-बड़ी बातों का समय बीत चुका है, अब बड़ी कार्रवाई का समय है। आज यौन अपराधों और यौन हिंसा को पूरी गंभीरता से संज्ञान में लेने की जरूरत है। काश! हमारे राजनीतिक दल इस मुद्दे पर पूरी ईमानदारी से ध्यान देते, तो देश में बलात्कार के मामले कम से कम हो रहे होते। निर्भया के समय जो कानून बने थे, कानून में जो सुधार हुए थे, उन्हें लोग भूल चुके हैं, तो क्या हमारी व्यवस्थाएं भी भूल चुकी हैं? यह एक ऐसा अपराध है, जो अपने उपचार में पूरी संवेदना की मांग करता है। जहां पूरी व्यवस्था को अपनी पूरी ममता और मरहम के साथ पीड़ित के पक्ष में खड़ा हो जाना चाहिए, वहीं उत्पीड़क के प्रति दया की गुंजाइश न के बराबर होनी चाहिए। सामाजिक, धार्मिक, सांविधानिक आधार पर कोई तर्क ऐसा नहीं, जिससे किसी बलात्कारी को किसी आड़ में पल भर के लिए भी बचाया जा सके। 
समाज में गुस्सा आज फिर चरम पर है, यह इशारा है कि कानून-व्यवस्था से लोग संतुष्ट नहीं हैं। आज फिर गांधीजी के सत्य, प्रेम, अहिंसा और शास्त्रीजी की दृढ़ता को याद कर आगे बढ़ने की जरूरत है। तंत्र को पूरी कड़ाई से अपने व्यवहार को परखना होगा और राजनेताओं को अपने दायरे में समदर्शी भाव रखना होगा। कानून-व्यवस्था के मामले में कम से कम राजनीति हो और सभी राजनीतिक दल अपने-अपने राज्य में ऐसे अपराधों को काबू में करने के हरसंभव प्रयास करें, तो इससे बढ़कर आज कोई दूसरी राष्ट्र सेवा नहीं होगी।

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  • Web Title:hindustan editorial column 2 october 2020