hindustan editorial column 17 September - शांति की ओर DA Image

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शांति की ओर

देश के किसी भी इलाके में हिंसा रोकने के प्रति भारत सरकार की सजगता और वहां के लोगों की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, दोनों ही भारतीय लोकतंत्र की सदैव स्वागतयोग्य विशेषताएं हैं। इस देश की व्यवस्था विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की संयुक्त जिम्मेदारी है। समय-समय पर ये तीनों एक-दूसरे को प्रेरित-संशोधित करते रहे हैं और देश में संविधान के साये में लोकतंत्र प्रशंसनीय रूप में पलता आ रहा है। स्थापित व्यवस्थाओं के तहत ही सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर की स्थिति के बारे में सरकार से दो सप्ताह में जवाब मांगा है, तो यह स्वाभाविक है। कश्मीर में केंद्र सरकार की सावधानी के 40 दिन बीत चुके हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि कोई भी व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगा सकता है। जम्मू-कश्मीर के संबंध में केंद्र सरकार से असहमत लोग सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं। न्यायालय की मंशा स्पष्ट है, वह जम्मू-कश्मीर में जल्द से जल्द सामान्य जिंदगी की बहाली चाहता है। केंद्र सरकार भी यही चाहती है और अब समय आ गया है, जब जम्मू-कश्मीर की सुलझी हुई सभ्य राजनीतिक आवाजों को सक्रिय होने का मौका दिया जाए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद को अपने घर-परिवार से मिलने जाने देने की इजाजत इस दिशा में उठाया गया सराहनीय कदम है। 
 

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान कुछ और चीजें भी स्पष्ट हुई हैं। न्यायालय में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला को विशेष जन सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार बताया गया है। इस कानून का इस्तेमाल कोई पहली दफा नहीं हुआ है। फारूक के पिता शेख अब्दुल्ला भी इस कानून के तहत बंद रहे हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि घाटी में अखबार निकल रहे हैं, दूरदर्शन सहित सारे चैनल वहां काम कर रहे हैं।

कश्मीर में 88 प्रतिशत थाना क्षेत्रों में पाबंदी नहीं है। अपने जवानों और आम नागरिकों की केंद्र सरकार को चिंता है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने यह भी याद दिलाया है कि वर्ष 2016 में भी एक कुख्यात आतंकवादी की मौत के बाद जम्मू-कश्मीर में तीन महीने फोन और इंटरनेट बाधित रहा था। याचिकाकर्ता की एक बड़ी शिकायत यह थी कि जम्मू-कश्मीर में उच्च न्यायालय तक पहुंचना आसान नहीं है। इसे प्रधान न्यायाधीश ने काफी गंभीरता से लेते हुए उच्च न्यायालय से रिपोर्ट मांगी है और कहा है कि जरूरत पड़ी, तो वह स्वयं श्रीनगर जाएंगे। हालांकि सरकार का यही कहना था कि कश्मीर में सभी अदालतें और लोक अदालतें अपना काम कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता केंद्र सरकार के लिए प्रेरक साबित होनी चाहिए, वहां जल्द ही सामान्य जीवन की बहाली हो। 
 

संविधान के तहत अदालत में की गई ऐसी कोशिशों से भारतीय लोकतंत्र ही मजबूत होगा। उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र के दबावों और उसकी मजबूरियों को समझेगा। सावधानी समय की मांग है, कहीं ऐसा न हो कि घाटी में पाबंदियों में ढील दी जाए और वहां हिंसा का नया दौर शुरू हो। सरकार को एक कदम आगे बढ़कर हरसंभव प्रयास करने होंगे कि इस दिशा में कश्मीरी भी अपने दायित्व को समझें। किसी को भी अपनी बात रखने के लिए पत्थरों और बंदूकों की कतई जरूरत न पड़े और भारतीय संविधान के तहत ही शांति आए और विकास हो।

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  • Web Title:hindustan editorial column 17 September