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हिंदी न्यूज़ ओपिनियन संपादकीयतुम्हें जीतना था सुशांत

तुम्हें जीतना था सुशांत

हिन्दुस्तान Rohit
Sun, 14 Jun 2020 09:47 PM
तुम्हें जीतना था सुशांत




भारत के सबसे युवा संजीदा अभिनेताओं में एक सुशांत सिंह राजपूत की विदाई जितनी दुखद है, उससे कहीं ज्यादा चिंताजनक है। भारत के सफलतम युवाओं में शुमार सुशांत महज 34 की उम्र में जिस तरह से दुनिया से गए हैं, उस पर सिर्फ अफसोस संभव है। सरकार और युवा उन्हें आदर्श निगाहों से देख रहे थे। वह नीति आयोग के विशेष महिला उद्यमी अभियान और सुशांत4एजुकेशन से जुडे़ थे। एक बहुत लंबा करियर उनके सामने था, लेकिन एक झटके में सब थम गया। यह सिनेमा उद्योग और देश के लिए सोचने-संभलने का वक्त है। 
कुछ बातें थीं, जो सुशांत को खास बनाती थीं। एक अभिनेता के रूप में वह संघर्ष करके ऊपर आए थे। दिल्ली में थियेटर से लेकर मुंबई में पवित्र रिश्ता  जैसे धारावाहिक में चमकने तक। सिनेमा में काय पो छे से छिछोरे  तक उनके बमुश्किल 12-13 साल के करियर में वह कभी भी हल्का काम करते नहीं दिखे। चुन-चुनकर अच्छी फिल्में करते थे और फिल्में भी अलग-अलग पृष्ठभूमि की। शुद्ध देसी रोमांस  से क्रिकेट के खिलाड़ी तक और जासूस से डकैत तक की भूमिका को उन्होंने परदे पर जीवंत कर दिखाया था। अच्छे निर्देशक भी अभिनेता के रूप में उनका महत्व मानने लगे थे और यह जान गए थे कि सुशांत के कुशल शरीर के सहारे अभिनय के नाना फूल खिलाए जा सकते हैं। वह केवल अभिनेता नहीं थे, एक पारंगत प्रशिक्षित पेशेवर नर्तक भी थे। वह भाव प्रबल सात्विक अभिनय की सीढ़ियां तेजी से चढ़ रहे थे। भारतीय क्रिकेटर महेंद्र सिंह धौनी की भूमिका को उन्होंने इतनी संजीदगी से अंजाम दिया कि उन्हें चाणक्य, टैगोर और कलाम जैसी महान हस्तियों के रूप में उतारने की तैयारियां शुरू हो गईं। अपने चरित्र या किरदार में डूब जाने का हुनर उन्हें अलग ही अभिनेता वर्ग में ला खड़ा करता था। चेहरे पर भोलापन लिए गुहार लगाता आज का युवा कि ‘हमको भी एक चांस दीजिए न सर’।  उनके चेहरे पर एक स्वाभाविक संकोच था, जो चालाक होते लोगों की दुनिया में विरल होता जा रहा है। एक निहायत घरेलू, मुस्कान की सहज रेखाओं से चमक उठने वाला चेहरा अब हमारे बीच नहीं है, तो हमें निराश होने की बजाय निजता की उन सूनी पड़ती गुफाओं की पड़ताल करनी चाहिए, जिनमें कभी अवसाद इतना गाढ़ा हो जाता है कि जिंदगी का दम घुटने लगता है। महान फिल्मकार गुरु दत्त भी ऐसे ही गए थे, महज 39 की उम्र थी और उन्हें आज भी याद किया जाता है। 34 या 39 की उम्र हार मानने की नहीं, समय से दो-दो हाथ करने की होती है। 
पटना में जन्मा और वहीं बचपन बिताने वाला यह कलाकार चकाचौंध भरी दुनिया में बहुत आगे निकल आया था और अभी उसे बहुत आगे और ऊंचाई पर अपना झंडा गाड़ना था, तो दुनिया देखती। दुर्भाग्य, असमय ही एक ऐसी यात्रा रुक गई है, जिसकी ओर, लाखों युवा हसरत भरी निगाहों से देख रहे थे। आज वही युवा याद कर रहे हैं, सुशांत अपनी फिल्म छिछोरे  में आत्महत्या के विरुद्ध पैरोकारी करते दिखे थे। बेशक, यह मौत एक चुनौती छोड़ गई है, बाहर चकाचौंध पैदा करने से ज्यादा जरूरी है, अपने अंदर के अंधेरे दूर करना। तमाम कलाएं सीखने से कहीं बड़ी कला है अपने अंदर आशा के दीप जलाए रखना। आज कोरोना जो शून्य पैदा कर रहा है, उसे देखते हुए आज इस कला की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा महसूस हो रही है।

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