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8 अप्रैल, 2020|2:14|IST

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सुधार के निर्देश

भारतीय राजनीति को दागियों से मुक्त करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट की एक और अहम कोशिश का न केवल स्वागत, बल्कि अनुकरण होना चाहिए। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए राजनीतिक दलों को जो निर्देश दिए हैं, उसकी बड़ी जरूरत महसूस की जा रही थी। कायदा तो यही है, राजनीतिक दल स्वयं ही दागियों से पल्ला झाड़ लेते और उन्हीं योग्य प्रत्याशियों को मैदान में उतारते, जिनका सार्वजनिक ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन भी उज्ज्वल है। इसमें कोई संदेह नहीं, नेताओं के चरित्र से ही राजनीति का चरित्र तय होता है। नेताओं के चरित्र सुधार की महती जिम्मेदारी राजनीतिक दलों पर है। सुप्रीम कोर्ट ने तमाम दलों से कहा है, जब कोई दल किसी दागी प्रत्याशी को चुनाव मैदान में उतारे, तो 48 घंटे के अंदर सार्वजनिक रूप से लोगों को यह बताए कि ऐसा क्यों किया?

खास बात यह है कि राजनीतिक दल प्रत्याशियों के जिताऊ होने की दलील देकर दागियों को टिकट देते हैं। अब जब राजनीतिक पार्टियां किसी दागी को खड़ा करेंगी, तो नामांकन के 24 घंटे के अंदर अपनी रिपोर्ट भी दाखिल करेंगी। रिपोर्ट न दाखिल करने को अवमानना माना जाएगा और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कार्रवाई के लिए चुनाव आयोग को अधिकृत कर दिया है। लगे हाथ, सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति नरिमन और न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट्ट ने साफ कर दिया है कि अब जिताऊ होने का तर्क नहीं माना जाएगा। जाहिर है, इससे राजनीतिक दलों पर दबाव कुछ बढ़ेगा। वे किसी दागी को मैदान में खड़ा करने का वाजिब तर्क खोजेंगे और संभव है, खोजने में कामयाब भी हो जाएं। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश हमें सुधार की दिशा में आगे ले जाएंगे, इसकी उम्मीद रखनी चाहिए।

यहां हमें यह समझना होगा कि राजनीतिक सुधार कोई एक दिन में पूरा होने वाला काम नहीं है। भारत में सुधार की प्रक्रिया धीमी जरूर है, लेकिन हमें भारतीय व्यवस्था की पारंपरिक उदारता को भी ध्यान में रखना चाहिए। ऐसी जनहित याचिकाओं की बड़ी जरूरत है, जो हमारी व्यवस्था में हर स्तर पर ईमानदारी को प्रेरित करें। देश में नेतृत्व के स्तर पर सुधार सबसे जरूरी है, इसलिए ताजा याचिका ज्यादा प्रशंसनीय है। भारत में राजनीतिक सुधारों की बहुत जरूरत है। ध्यान रहे, भारतीय राजनीति के अपराधीकरण या राजनीति में अपराधियों की दखल पर एनएन वोहरा समिति ने 1993 में रिपोर्ट दी थी, जो संसद में पेश हुई थी। तब से अब तक 26 साल बीत गए, भारतीय राजनीति में दागियों की भूमिका घटने की बजाय बढ़ती जा रही है।

उदाहरण के लिए, 2004 के आम चुनाव में 24 प्रतिशत दागी चुने गए थे, 2009 के चुनाव में 30 प्रतिशत, 2014 के चुनाव में 34 प्रतिशत और 2019 के चुनाव में विजेता दागियों का प्रतिशत बढ़कर 43 हो गया। राजनीतिक दलों ही नहीं, हम मतदाताओं को भी अपने गिरेबां में झांकना होगा और पूछना होगा कि राजनीति में अपराधियों की संख्या आखिर क्यों बढ़ती जा रही है? हम दागियों को क्यों वोट देते हैं? न्यायाधीशों को जो करना है, वे कर रहे हैं। अपनी ओर से चुनाव आयोग ने भी अपराधियों को चुनाव लड़ने से वंचित करने के उपाय किए हैं, पर अंतत: जिम्मेदारी हम नागरिकों पर ही है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा दिशा-निर्देश भी हमें हमारे कर्तव्यों की फिर याद दिला रहे हैं। 

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  • Web Title:Hindustan Editorial Column 14th February 2020