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27 नवंबर, 2020|5:11|IST

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अब रुके मनमानी

एंबुलेंस सेवा की दरें तय करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की जितनी सराहना की जाए, कम होगी। कोरोना मरीजों को अस्पताल पहुंचाते हुए जिस तरह से लूटा जा रहा है, उस पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा चिंता का इजहार सराहनीय ही नहीं, स्वागतयोग्य भी है। अनेक भुक्तभोगी हैं, जिनकी आवाज कहीं कोई नहीं सुन रहा था। बड़ी संख्या में जरूरतमंद लोग हालात से मजबूर थे और उन्होंने बहुत मुश्किल के साथ अस्पताल व जांच केंद्रों तक का सफर तय किया। अब लोगों को इस फैसले से यथोचित राहत का एहसास होगा। अदालत ने कहा है कि हम निर्देश देते हैं, राज्य सरकारें उचित शुल्क तय करें। 
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के पक्ष को मजबूत करते हुए कहा है कि राज्य महामारी से निपटने के लिए केंद्र की ओर से जारी की गई ‘एडवाइजरी’ से बंधे हुए हैं और सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोविड रोगियों को अस्पताल ले जाने के लिए प्रत्येक जिले में पर्याप्त संख्या में एंबुलेंस उपलब्ध हों। एंबुलेंस की उपलब्धता के साथ ही उनकी सेवा दरों को भी निर्धारित किया जाए, ताकि किसी भी मरीज से मनमानी वसूली न हो सके। यह केवल एंबुलेंस सेवा या उसकी दरों से जुड़ा मामला नहीं है। कोरोना के समय में केंद्र सरकार की ओर से अनेक विशेषज्ञ दिशा-निर्देश जारी हुए हैं, लेकिन उनकी अवहेलना हम साफ तौर पर देख रहे हैं। हर राज्य सरकार अपने ढंग से जूझ रही है। कुछ राज्यों ने अच्छा प्रदर्शन किया है, तो वहीं ज्यादातर राज्यों में चिकित्सा व्यवस्था की कलई खुल गई है। कोरोना जांच के मानकों में भी मनमानी हुई है। सैनेटाइजर और मास्क तक में मनमानी हुई है। ऐसी महामारी के दौर में भी छोेटे-छोटे सुरक्षा सामान को भी ऊंचे दामों पर बेचकर खूब कमाई करने वाले कम नहीं हैं, उन्हें लगता है कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। जरूरतमंदों की परेशानी और चिंता का बहुत फायदा उठाया गया है। क्या राज्य सरकारें एंबुलेंस सेवा की दरें खुद ही तय नहीं कर सकती थीं, इस काम के लिए सुप्रीम कोर्ट से निर्देश लेने की क्या जरूरत थी? और जब निर्देश आ गए हैं, तो राज्य सरकारें कितनी मुस्तैदी से दरें तय करेंगी और किस हद तक इन दरों को लागू किया जा सकेगा? बेशक, फटकार सुनकर दरें तय कर देना और लोगों को दिखा देना ही पर्याप्त नहीं है। इन दरों को कड़ाई से लागू करना भी जरूरी है। 
यह कोई छिपी बात नहीं कि सरकारी एंबुलेंस सेवा अपने देश में कभी भी पर्याप्त नहीं रही, जिसकी वजह से लोगों को वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत पड़ती है। अनेक निजी सेवा संस्थान बहुत मामूली दर पर या मुफ्त सेवा उपलब्ध कराते हैं, जबकि ऐसे अनेक व्यापारी हैं, जो एंबुलेंस सेवा से भी कमाई की बेशर्म राह निकाल लेते हैं। इस मामले में याचिकाकर्ता के वकील ने माना है कि सरकार ने मार्च में ही दिशा-निर्देश जारी कर दिए थे, हालांकि, शुल्क निर्धारण की कोई बात उसमें नहीं थी। वाकई, राज्य सरकारों ने भी अपने स्तर पर जिला प्रशासन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए होंगे, लेकिन उसमें भी शुल्क निर्धारण की बात नहीं होगी। यह परिपाटी नई नहीं है, हमारी चिकित्सा व्यवस्था में कमाई करने वालों के लिए असीम गुंजाइश यूं ही छोड़ दी जाती है। कोरोना महामारी के दौर में हमें चिकित्सा क्षेत्र में कमाई की तमाम अमानवीय गुंजाइशों को हर स्तर पर खत्म कर देना चाहिए।

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  • Web Title:hindustan editorial column 12 september 2020