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हमारा दीया

दीपावली का पांच दिवसीय त्योहार जब भी आता है, परिवेश में स्वाभाविक ही उत्सवों का उल्लास झलकने लगता है। जब यह दीपोत्सव अंधेरों के खिलाफ लड़ने का समय है, तब स्वाभाविक ही अपने आसपास के अंधेरों की हमें...

हमारा दीया
Amitesh Pandeyहिन्दुस्तानFri, 10 Nov 2023 10:28 PM
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दीपावली का पांच दिवसीय त्योहार जब भी आता है, परिवेश में स्वाभाविक ही उत्सवों का उल्लास झलकने लगता है। जब यह दीपोत्सव अंधेरों के खिलाफ लड़ने का समय है, तब स्वाभाविक ही अपने आसपास के अंधेरों की हमें समीक्षा करनी चाहिए। साल 2023 की दीपावली के समय हम देख रहे हैं कि पश्चिम एशिया में कैसा भयंकर युद्ध चल रहा है। इस युद्ध में निर्दोष भी मारे जा रहे हैं और अस्पतालों को भी निशाना बनाया जा रहा है। पिछले साल से चल रहा रूस-यूक्रेन युद्ध भी थमने का नाम नहीं ले रहा, जिसका व्यापक असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ चुका है। रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से ऊर्जा संकट के साथ ही खाद्यान्न का संकट भी महसूस हुआ था और पश्चिम एशिया में युद्ध का दायरा फैला, तो कच्चे तेल व ऊर्जा के क्षेत्र को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। इस दीपावली मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आर्थिक मंदी से जूझती दुनिया में आखिर इतने युद्ध क्यों लडे़ जा रहे हैं? क्या युद्ध लड़ने से हमारे तन-मन-धन को कोई लाभ होता है? यह बहुत दुखद है कि जब कहीं युद्ध छिड़ता है, तो हम किसी न किसी लड़ने वाले के पक्ष में खड़े हो जाते हैं? क्या मेरा दीया-तेरा दीया की गलाकाट होड़ में हमारा दीया कहीं बुझने तो नहीं लगा है? 
दुनिया में अनेक महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने मानव सभ्यता से यह उम्मीद की थी कि हममें से कोई दीया हो जाएगा, कोई बाती, तो कोई तेल और कोई अग्नि या प्रकाश की रक्षा के लिए समर्पित हो जाएगा, तब मानवता का दीया हमेशा रोशन रहेगा। दुनिया के अनेक देशों में ऐसा हुआ भी है, पर दुर्भाग्य है, हाल-फिलहाल लगभग 40 ऐसे देश हैं, जहां किसी न किसी प्रकार की अशांति व्याप्त है। दुनिया के 32 देशों में खूनी संघर्ष की स्थिति है। तीन से ज्यादा जगहों पर देशों के बीच युद्ध जारी है। लगभग 18 देशों में किसी न किसी प्रकार का उग्रवाद या आतंकवाद हावी है। दुनिया में नाना प्रकार की हिंसा की वजह से प्रतिवर्ष पांच लाख के करीब लोग मारे जाते हैं। यह तो और भी दुखद पक्ष है कि गरीब देशों में ज्यादा हिंसा हो रही है, विकसित देशों में अपेक्षाकृत शांति है। ऐसे में, सवाल पैदा होता है कि विकासशील देशों में युद्धों या संघर्षों को रोकने के बारे में विकसित या अमीर देशों की क्या सोच है? क्या ताकतवर देशों को केवल अपने दीये की चिंता है? पिछले दो साल की यह बहुत दुखद त्रासदी है कि दुनिया के वीटो पावर प्राप्त देश ही दो खेमों में बंट गए हैं, जिसके चलते हजारों मासूमों का खून बह रहा है।
भारत की अगर बात करें, तो हमारी बढ़ती चमक पर आतंकवादी, उग्रवादी के साथ ही माओवादी भी खतरा बने हुए हैं। खासकर इस साल मणिपुर में कुकी और मैतेई समाज ने देश के सामने जो चुनौती खड़ी की है, उसके समाधान की प्रार्थना हमें इस दिवाली पर जरूर करनी चाहिए। सच्ची दिवाली का मतलब है सद्भाव से ओत-प्रोत दिवाली। यह देश के कोने-कोने में मनाई जानी चाहिए। जाति-धर्म के पैमानों से ऊपर उठकर भारतीय समाज के तन-मन-धन को और बढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए। हम सवा अरब से ज्यादा भारतीयों को अपनी पूरी ऊर्जा अपने देश के उत्थान को तेज करने में लगानी चाहिए और ऐसा तभी होगा, जब हम परस्पर संघर्ष व लड़ाइयों से बचेंगे। हम सबके सहज समन्वय से जब हमारा दीया जलने लगेगा, तब हम दुनिया को अपनी दीपावली का सच्चा संदेश दे सकेंगे।  

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