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10 अगस्त, 2020|1:55|IST

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लॉकडाउन की वापसी

तेजी से फैलते कोरोना वायरस के मद्देनजर जो राज्य सरकारें फिर लॉकडाउन लगाने के लिए विवश हो रही हैं, उनकी मजबूरियों और जरूरतों, दोनों को समझा जा सकता है। शुक्रवार रात से सोमवार सुबह तक उत्तर प्रदेश में पूर्ण रूप से जो लॉकडाउन लगाया गया है, उसके महत्व को समझना कठिन नहीं है। यही वे दिन होते हैं, जब लोग घरों से बाहर निकलकर कहीं न कहीं, किसी न किसी मकसद से भीड़ लगाते हैं। कोरोना के समय भीड़ सबसे बड़ा खतरा है। भीड़, अनजान व संदिग्ध लोगों से बचकर ही हम कोरोना से अपनी हिफाजत कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें, तो बलिया में 21 जुलाई तक के लिए संपूर्ण लॉकडाउन लगा दिया गया है। सभी दफ्तर, प्रतिष्ठान, बाजार बंद कर दिए गए हैं और लोगों को घरों में रहने के लिए फिर पूरी कड़ाई से कहा जा रहा है। कहना न होगा कि कुछ राज्यों में शारीरिक दूरी बनाए रखने और मास्क न पहनने के लिए जो सजा तय की गई थी, उसका कोई बहुत प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं पड़ा है। लोग अभी भी उतने सावधान नहीं हैं कि अपने को सुरक्षित रख सकें। 

भारत में कोरोना वायरस के मामले आठ लाख के करीब पहुंच चुके हैं और मरने वालों की संख्या 22 हजार पार कर जाएगी। ऐसे में, जिन राज्यों में कोरोना का संक्रमण तेज हो रहा है, वहां चिंता वाजिब है। राजधानी पटना सहित बिहार के 10 जिलों में पूर्ण तालाबंदी शुरू हो रही है। कोलकाता सहित पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में, मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में और असम में तालाबंदी का नया दौर शुरू हो गया है। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु, केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम, और असम की राजधानी गुवाहाटी में तालाबंदी चिंता दर्शा रही है। पुणे में भी दस दिनों के लिए तालाबंदी लागू होने वाली है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के अनेक क्षेत्रों में फिर कड़ाई की वापसी हो गई है। बेशक, केंद्र सरकार ने अनलॉक 2.0 के दिशा-निर्देश जारी किए थे, पर राज्य सरकारों को  स्थानीय स्थिति के आधार पर फैसला लेना पड़ रहा है और यह कहीं से गलत नहीं है। 

देश के एक बड़े हिस्से में फिर वीरानी लौट आई है, तो हमें पहले से ज्यादा सतर्क हो जाना चाहिए। यह बार-बार कहा गया है कि हमारी सावधानी से ही हमें रोजमर्रा की स्वतंत्रता या अनलॉक होने की सुविधा हासिल हो सकती है। दुर्भाग्य या बड़ी खामी है कि जरूरी सावधानियां न बरतते हुए लोगों ने अपने यहां लॉकडाउन की वापसी करा ली है। अब जहां लोगों को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए कि उन्होंने अनलॉक होते समय में क्या किया, वहीं सरकारों को भी छूट रही खामियों-कमियों पर नए सिरे से सोचना होगा। हम पूर्ण लॉकडाउन की स्थिति में फिर नहीं जा सकते, क्योंकि अब जो आर्थिक-सामाजिक नुकसान होगा, उसकी भरपाई बहुत मुश्किल होती जाएगी। जो लोग या जो मजदूर काम पर लौट आए हैं, उनका क्या होगा? जो परियोजना या उद्यम फिर जोर पकड़ रहे हैं, उनको आगे बढ़ने की ताकत कैसे मिलेगी? क्या फिर लॉकडाउन और उसके परिणामों से दो-दो हाथ करने के लिए देश तैयार है? हम यह देख चुके हैं कि भारत में जरूरतमंद लोगों को ज्यादा बैठाकर नहीं रखा जा सकता। उन्हें तमाम सावधानियों के साथ काम पर लगाए रखना होगा, ताकि उनकी जिंदगी व देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार और बाधित न हो। हमें पीड़ित समाज नहीं, सचेत समाज चाहिए।

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  • Web Title:hindustan editorial column 11 july 2020