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27 नवंबर, 2020|5:14|IST

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अभी और इंतजार

जिस वैक्सीन का सबसे ज्यादा इंतजार था, उसके मार्ग में नई बाधा का आना अफसोस की बात है, लेकिन इससे वैज्ञानिकों को नई ऊर्जा भी मिलेगी। कोई भी वैज्ञानिक प्रयोग कभी विफल नहीं होता। विज्ञान की विफलता में भी कोई न कोई कामयाबी छिपी होती है। हो सकता है, जिस वैक्सीन की कमी उजागर हुई है, वही वैक्सीन विकसित होकर हमारे सामने आ जाए। बहुराष्ट्रीय एस्ट्राजेनेका कंपनी से संसार भर के लोग खुशखबरी की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन कंपनी ने अपने अंतिम चरण के वैक्सीन परीक्षण को रोक दिया है। परीक्षण में शामिल एक व्यक्ति के बीमार पड़ने के बाद यह कदम उठाना स्वाभाविक ही है। यह सकारात्मक बात है कि इस बाधा को कंपनी ने एक सामान्य रुकावट माना है। जांच की जाएगी कि क्या वैक्सीन की वजह से एक व्यक्ति बीमार पड़ा है या उसकी बीमारी की कोई अन्य वजह है। यदि परीक्षण में शामिल उस व्यक्ति के बीमार पड़ने का कोई अन्य कारण सामने आया, तो फिर वैक्सीन के प्रयोग को आगे बढ़ाया जाएगा। हरेक दवा का व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग असर होता है, यदि किसी दवा के परीक्षण में शामिल सभी लोग बीमार पड़ जाएं, तो चिंता की बात होती है। 
हालांकि, कंपनी ने यह नहीं बताया कि उस व्यक्ति को क्या बीमारी हुई। कम से कम वैज्ञानिकों को इस बीमारी का पता चलना चाहिए और परीक्षण के परिणामों को साझा करना चाहिए। दुनिया भर में अभी 100 ज्यादा जगह कोरोना के वैक्सीन या दवा की तलाश जारी है। कहीं भी कोई कामयाबी या नाकामी सामने आए, तो उसे कम से कम वैज्ञानिकों के बीच साझा करना न केवल यथोचित, बल्कि मानवीयता भी है। आज दुनिया जिस निर्णायक मोड़ पर है, वहां हर देश चीन की तरह गोपनीय नहीं हो सकता। चीन वुहान में कोरोना को नियंत्रित करने के बाद अपने गुण गाने में जुटा है, लेकिन उसने दुनिया को यह नहीं बताया कि उसके यहां कोरोना की वास्तविक स्थिति क्या है? आखिर वुहान में सामान्य जन-जीवन की वापसी कैसे हुई? वह दुनिया को बीमारी देने के बाद खुद को कोरोना चिंता से मुक्त और मस्त दिखाने में जुटा है, जबकि विशेष रूप अमेरिका, यूरोप, भारत, ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक कोरोना वैक्सीन बनाने में दिन-रात एक किए हुए हैं। अभी तक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर दवा विकसित करने में जुटी एस्ट्राजेनेका को सबसे आगे माना जा रहा था, लेकिन अब इंतजार का समय लंबा हो गया है, लेकिन निराश कतई नहीं होना चाहिए। 
इधर, भारत में प्लाज्मा थेरेपी को रामबाण माना जा रहा था, दिल्ली, मुंबई और कुछ अन्य शहरों में प्लाज्मा बैंक भी बन गए थे, लेकिन आईसीएमआर ने इस थेरेपी को बहुत कारगर नहीं माना है। देश के 39 अस्पतालों में किए गए अध्ययन से यह बात सामने आई है कि यह थेरेपी सभी में समान रूप से काम नहीं कर रही है। यह थेरेपी करीब 13.6 प्रतिशत लोगों की जान नहीं बचा पाई है, इसलिए इसे पुख्ता नहीं माना जा सकता। इन नतीजों को भी नाकामी नहीं कहा जा सकता, हो सकता है, प्लाज्मा थेरेपी पर भी अलग ढंग से काम करने की जरूरत हो। बहरहाल, वैज्ञानिकों और डॉक्टरों को कतई निराश नहीं होना चाहिए। दुनिया भर के लोग तो यही चाहेंगे कि जो भी दवा सामने आए, सोलह आना कारगर होकर ही आए।

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  • Web Title:hindustan editorial column 10 september 2020