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8 मई, 2021|7:54|IST

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संप्रभुता की चिंता

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भारतीय समुद्री क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना का अभ्यास बड़ी चिंता का विषय है। यह मामला सीधे-सीधे भारत की संप्रभुता से जुड़ा है और सजगता से भी। खुद अमेरिकी नौसैनिक बेडे़ ने माना है कि उसने भारत के ‘एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन’ में अभ्यास किया है। अमेरिकी बेडे़ की ओर से जारी विज्ञप्ति इशारा करती है कि अमेरिकी पहले भी भारतीय समुद्री सीमा में आते रहे हैं। अमेरिका भारत का मित्र देश है और यदा-कदा उसका भारतीय क्षेत्र में आ जाना विशेष गंभीरता की बात नहीं है, लेकिन अगर बिना सूचना भारतीय क्षेत्र में अभ्यास की शुरुआत हो रही है, तो इस गलत परंपरा पर लगाम लगाना जरूरी है। अमेरिका भारत की मंजूरी के साथ आए, कोई हर्ज नहीं, लेकिन भारतीय क्षेत्र में किसी अन्य देश द्वारा सैन्य अभ्यास की सूचना छिपी नहीं रहनी चाहिए। अमेरिका ने अगर छिपाया है, तो दाल में कुछ काला देखना गलत नहीं है। विशेषज्ञों को चिंता हो रही है, तो उस चिंता को दूर करना भारतीय विदेश व रक्षा मंत्रालय के लिए जरूरी है। अमेरिकी नौसेना की सातवीं फ्लीट की टिप्पणी विशेष रूप से सवाल खडे़ कर रही है। क्या अमेरिकी बल भारत-प्रशांत क्षेत्र में हर दिन ऑपरेशन करते हैं? क्या ये सभी ऑपरेशन किन्हीं अंतरराष्ट्रीय कानूनों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं? अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है? क्या अमेरिकी सुरक्षा बल कहीं भी उड़, तैर और अभ्यास कर सकते हैं? 
यदि अमेरिकी बेडे़ के जवाब में भारत की परवाह शामिल नहीं है, तो आधिकारिक स्तर पर भारत को अपनी बात रखनी चाहिए। ऐसा ही खतरा जब चीन की ओर से अंडमान निकोबार के पास पैदा हुआ था, तब भारत ने कड़ी आपत्ति की थी, ठीक वैसी ही आपत्ति अमेरिका के साथ भारत भले न जताए, पर इतना दबाव तो बनाना ही चाहिए कि अमेरिकी बेड़ा अपने जवाब में शालीनता और मित्रता के शब्द जरूर रखे। भारत जैसे दूसरे देशों की संप्रभुता की कद्र करता है, ठीक वैसी ही उम्मीद उसका हक है। ऐसा न हो कि कोई देश मित्रता का सहारा लेकर भारत की अवहेलना करे। कतई जरूरी नहीं कि अमेरिका के साथ संबंधों में भारत एक विवाद पैदा कर ले, लेकिन अपनी गरिमा की रक्षा के लिए सजग होना अनिवार्य है। कायदा यह है कि किसी भी तटीय देश के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन की सीमा समुद्र तट से 200 नॉटिकल मील यानी 370 किलोमीटर की दूरी तक होती है। इस क्षेत्र में मौजूद समुद्री संसाधनों पर संबंधित देश का अधिकार होता है। अत: कोई शक नहीं कि अमेरिका को पूछकर ही अभ्यास करना चाहिए था। अगर अमेरिका ने ऐसा नहीं किया है, तो इसके दो अर्थ हो सकते हैं। पहला, भारत से मित्रता का वह लाभ लेना चाहता है और उसे लगता है, चीन की वजह से उलझा भारत आपत्ति नहीं करेगा। दूसरा अर्थ, विगत दिनों अमेरिकी मंत्रियों और विशेष दूत ने भारत दौरा किया है, क्या कोई ऐसी बात है, जो भारत ने नहीं मानी है, या जो अमेरिका को बुरी लगी है, और वह भारत को दबाव में लाना चाहता है। आज जिस दौर में दुनिया है, उसमें किसी भी आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। हमें अधिकतम पारदर्शिता के साथ चलना चाहिए। अपने स्वभाव के अनुरूप संभावनाओं की तलाश भारत को जारी रखनी चाहिए और यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उदारता किसी भी मोर्चे पर देश के लिए बोझ न बने।

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  • Web Title:hindustan editorial column 10 april 2021